‘आमों पर बात करने का समय है.. छात्रों पर नहीं’, CBSE कॉपी स्कैनिंग पर राहुल गांधी का बड़ा आरोप
टेंडर में हेराफेरी, रोबोटिक स्कैनर की जगह सस्ता मोबाइल, लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल- क्या डिजिटल इंडिया सिर्फ नारा है?
नई दिल्ली। वर्ष 2026 के CBSE कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा परिणामों के बाद एक ऐसा विवाद सामने आया है जो पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और CBSE पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करने के लिए आधुनिक रोबोटिक स्कैनरों की जगह मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया गया। इससे स्कैन की गुणवत्ता खराब हुई, ब्लर्ड इमेज, गुम पेज और गलत मूल्यांकन की शिकायतें आईं, जिससे करीब 18.5 लाख छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ। यह मामला महज एक तकनीकी खामी नहीं, बल्कि शैक्षणिक व्यवस्था में गहरी लापरवाही और संभावित मिलीभगत को उजागर करता है।
तथ्य क्या कहते हैं?
CBSE ने पहली बार पूर्ण रूप से ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम लागू किया। मई 2025 के टेंडर में स्पष्ट शर्तें थीं: स्वचालित रोबोटिक स्कैनर, स्पाइन (बाइंडिंग) सुरक्षित रखना और न्यूनतम 300 DPI रिजॉल्यूशन। लेकिन अगस्त 2025 में टेंडर संशोधित किया गया। रोबोटिक स्कैनर की अनिवार्यता हटी, रिजॉल्यूशन 200 DPI तक घटा और अन्य मानक ढीले किए गए। नतीजा? COEMPT Edu Teck कंपनी को ठेका मिला, जिसके बाद छात्रों ने धुंधली छवियां, छाए हुए पेज और गलत अपलोड की शिकायतें शुरू कीं। कई छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिका ही नहीं मिली या गलत कॉपी दिखाई गई।
राहुल गांधी ने इसे “फ्रॉड” बताया और कहा कि पीएम मोदी के पास आमों की किस्मों पर भाषण देने का समय है, लेकिन इन 18.5 लाख छात्रों पर चुप्पी साधे रखना उनकी उदासीनता या मिलीभगत दर्शाता है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अभी भी पद पर हैं, जबकि सिस्टम की नाकामी स्पष्ट है।
CBSE का बचाव है कि टेंडर बदलाव ज्यादा बिडर्स आकर्षित करने के लिए किए गए और प्रक्रिया GFR (जनरल फाइनेंशियल रूल्स) के अनुसार हुई। लेकिन तथ्य अलग कहानी बयान करते हैं कई दौर के टेंडर असफल रहे, फिर मानक घटाए गए ताकि COEMPT योग्य हो सके। छात्र शोधकर्ता सार्थक सिद्धांत जैसे युवाओं ने दस्तावेजों से यह उजागर किया।
शिक्षा व्यवस्था की जड़ों में कमजोरी
यह घटना भारतीय शिक्षा व्यवस्था की पुरानी और गहरी कमजोरियों को उजागर करती है। दशकों से हमारी व्यवस्था रट्टा मारने, परीक्षा-केंद्रित और कम संसाधनों वाली रही है। मोदी सरकार के कार्यकाल में NEP 2020 जैसे बड़े नारे दिए गए डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत। लेकिन अमल में भारी खामी दिखती है।
CBSE जैसी राष्ट्रीय संस्था, जो लाखों छात्रों की नियति तय करती है, इतनी बड़ी प्रक्रिया को बिना पर्याप्त तैयारी और गुणवत्ता नियंत्रण के आउटसोर्स कर देती है। जहां हाई-टेक रोबोटिक सिस्टम और सख्त मानक जरूरी थे, वहां सस्ते ठेकेदार और मोबाइल फोन थोप दिए गए। यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता “डिजिटलीकरण का प्रदर्शन” है, न कि वास्तविक गुणवत्ता।
भारत में शिक्षा बजट GDP का 3% के आसपास है, जो विकसित देशों से बहुत कम है। स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं, शिक्षक ट्रेनिंग अपर्याप्त, और मूल्यांकन प्रक्रिया मानवीय त्रुटियों और अब तकनीकी लापरवाही से ग्रस्त। OSM का उद्देश्य पारदर्शिता लाना था, लेकिन खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और जल्दबाजी में लागू करने से उल्टा असर हुआ। छात्रों की उत्तर पुस्तिकाएं AWS सर्वर पर संभवतः कम सुरक्षित रहीं, सिक्योरिटी वल्नरेबिलिटी की खबरें आईं।
पिछले वर्षों में NEET पेपर लीक, UGC-NET विवाद जैसी घटनाएं पहले ही युवाओं का विश्वास तोड़ चुकी हैं। CBSE OSM अब उस सूची में शामिल हो गया। लाखों छात्रों की एक साल की मेहनत, कोचिंग फीस, माता-पिता का त्याग सब एक खराब स्कैन की भेंट चढ़ गया। रीवैल्यूएशन में भी फीस वसूली जा रही है, जिसे राहुल गांधी ने “पिकपॉकेटिंग” कहा।
सरकार पर सवाल.. जवाबदेही कहां?
मोदी सरकार शिक्षा सुधार का दावा करती है, लेकिन बार-बार विवादों से घिरी रहती है। टेंडर प्रक्रिया में बार-बार बदलाव, CMMI लेवल 5 से 3 तक घटाना, फाइनेंशियल क्राइटेरिया में फेरबदल ये सब संदेह पैदा करते हैं। क्या एक खास कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए मानक घटाए गए? COEMPT की पिछली परफॉर्मेंस (तेलंगाना में विवाद) को नजरअंदाज क्यों किया गया?
सरकार की चुप्पी चिंताजनक है। छात्र सवाल पूछ रहे हैं तो उन्हें “एंटी-नेशनल” बताकर जवाब दिया जा रहा है, जबकि असली मुद्दे पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा या कम से कम जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है। SIT और न्यायिक जांच की जरूरत है ताकि सच्चाई सामने आए।
शिक्षा तंत्र को मजबूत बनाने की चुनौती
यह विवाद सिर्फ CBSE तक सीमित नहीं। यह पूरे सिस्टम की कमजोरी दिखाता है जहां नीति बड़े-बड़े नारे हैं, लेकिन क्रियान्वयन में लापरवाही। युवा देश भारत में डेमोग्राफिक डिविडेंड तभी काम आएगा जब शिक्षा गुणवत्तापूर्ण, निष्पक्ष और भविष्योन्मुखी होगी।
छात्रों का भविष्य राजनीतिक लाभ या सस्ते ठेकेदारी का खेल नहीं बनना चाहिए। राहुल गांधी का हमला युवाओं की आवाज है, जो सिस्टम में सुधार चाहते हैं। मोदी सरकार को अब चुप्पी तोड़कर ठोस जवाब देना होगा। अगर शिक्षा का आधार ही कमजोर रहा तो “विकसित भारत 2047” का सपना अधूरा रहेगा।
समय आ गया है जवाबदेही तय करने का। लाखों परिवार पीड़ित हैं। सरकार को छात्र हित में काम करना चाहिए, वरना युवा वोटर आने वाले चुनावों में हिसाब जरूर मांगेंगे।
