छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी सिर्फ 2.3%, लेकिन पूरी कहानी कुछ और!
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से जारी पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 की रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों की बेरोजगारी दर को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर केवल 2.3 प्रतिशत दर्ज की गई है। वहीं मध्य प्रदेश में यह 1.5 प्रतिशत और गुजरात में 1 प्रतिशत से भी कम बताई गई है। पहली नजर में यह आंकड़े काफी सकारात्मक दिखाई देते हैं, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या वास्तव में राज्य के लगभग 98 प्रतिशत लोगों के पास रोजगार उपलब्ध है?
बेरोजगारी दर का असली मतलब क्या होता है?
आम लोगों के बीच यह धारणा रहती है कि बेरोजगारी दर का मतलब कुल आबादी में बेरोजगार लोगों की संख्या होता है, लेकिन तकनीकी रूप से ऐसा नहीं है। बेरोजगारी दर केवल उन लोगों का प्रतिशत बताती है जो श्रम बल का हिस्सा हैं और सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं मिल पा रहा। श्रम बल में वे लोग शामिल होते हैं जो काम कर रहे हैं या काम ढूंढ रहे हैं। यानी जो लोग किसी कारण से नौकरी की तलाश ही नहीं कर रहे, वे इस आंकड़े में शामिल नहीं होते।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बड़ा अंतर
PLFS रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर सिर्फ 1.8 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह बढ़कर 5.7 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। यह अंतर कई अहम संकेत देता है। ग्रामीण इलाकों में लोग लंबे समय तक बिना काम के नहीं रह सकते। खेती, मजदूरी, छोटे-मोटे व्यवसाय या अस्थायी काम के जरिए लोग किसी न किसी तरह रोजगार में जुड़े रहते हैं। वहीं शहरों में शिक्षित युवा बेहतर नौकरी की तलाश में लंबे समय तक बेरोजगार रहने का जोखिम उठाते हैं।
रोजगार है, लेकिन क्या वह स्थायी और पर्याप्त है?
रिपोर्ट में यह जरूर कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हर व्यक्ति के पास स्थायी या अच्छी आय वाला रोजगार है। यदि कोई व्यक्ति हफ्ते में कुछ घंटे भी अपने खेत में काम करता है या छोटा-मोटा स्वरोजगार करता है, तो उसे “रोजगारशुदा” माना जाता है। चाहे उसकी आय बेहद कम क्यों न हो। यही कारण है कि कम बेरोजगारी दर के बावजूद लोगों के आर्थिक हालात मजबूत दिखाई नहीं देते। विशेषज्ञ इसे “अल्प-रोजगार” और “प्रच्छन्न बेरोजगारी” की स्थिति बताते हैं। यानी लोग तकनीकी रूप से रोजगार में हैं, लेकिन उनकी आय और काम की गुणवत्ता पर्याप्त नहीं है।
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महिलाओं और पुरुषों के आंकड़ों में भी अंतर
रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में महिलाओं की बेरोजगारी दर 2.2 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि पुरुषों में यह 2.4 प्रतिशत बताई गई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खेती, पशुपालन और घरेलू कामों में योगदान देती हैं, जिन्हें कई बार रोजगार की श्रेणी में गिना जाता है। लेकिन इसके बावजूद उनकी आय सीमित रहती है और औपचारिक रोजगार में भागीदारी कम होती है।
गुजरात और मध्य प्रदेश के आंकड़े क्या बताते हैं?
रिपोर्ट में गुजरात की बेरोजगारी दर 0.9 प्रतिशत और मध्य प्रदेश की 1.5 प्रतिशत बताई गई है। गुजरात में औद्योगिक और विनिर्माण गतिविधियां ज्यादा होने के कारण अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों को अपेक्षाकृत आसानी से काम मिल जाता है। लेकिन रोजगार की उपलब्धता का अर्थ यह नहीं कि सभी को उच्च गुणवत्ता वाली नौकरी मिल रही है। वहां भी कम वेतन, अस्थायी रोजगार और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है।
कम बेरोजगारी दर सफलता या मजबूरी?
विशेषज्ञों का मानना है कि गरीब और कृषि प्रधान राज्यों में कम बेरोजगारी दर कई बार आर्थिक मजबूरी को भी दर्शाती है। लोग लंबे समय तक बेरोजगार रहने की स्थिति में नहीं होते, इसलिए जो भी काम मिलता है, उसे स्वीकार कर लेते हैं। ठेला लगाना, दिहाड़ी मजदूरी, खेतों में सीमित काम या छोटे स्वरोजगार भी रोजगार की श्रेणी में आ जाते हैं। ऐसे में आंकड़ों में बेरोजगारी कम दिखाई देती है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता और आय का स्तर बड़ा सवाल बना रहता है।
आंकड़ों के पीछे की वास्तविकता समझना जरूरी
PLFS 2025 की रिपोर्ट निश्चित रूप से यह संकेत देती है कि छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी काम से जुड़े हुए हैं। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि रोजगार की गुणवत्ता, आय, स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा जैसे पहलुओं को भी समझा जाए। सिर्फ कम बेरोजगारी दर को विकास का संकेत मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती ऐसे रोजगार पैदा करना है जो लोगों को स्थायी आय, बेहतर जीवन स्तर और सुरक्षित भविष्य दे सकें।
