कोरबा में दिवाली पर भी नहीं बुझा संघर्ष का दीया, भू-स्थापित आदिवासी तिरंगा लेकर मांग रहे अपना हक
कोरबा। दिवाली के दिन जब पूरा प्रदेश दीपों की रौशनी में डूबा हुआ था, उसी समय कोरबा जिले के भू-स्थापित आदिवासी अपने हक की लड़ाई लड़ रहे थे। एक ओर जीएम ऑफिस के सामने भू-स्थापित प्रदर्शनकारियों ने धरना दिया, तो दूसरी ओर खदान क्षेत्र में महिलाएं तिरंगा लेकर सड़कों पर निकलीं। इनका एक ही सवाल था — “हमारी जमीन से कोयला निकाला जा रहा है, लेकिन हमें क्या मिला?”
सरकार और कोल कंपनियों की नीतियों पर सवाल उठाते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि जितना कोयला 25 साल में निकलना था, वो मात्र 5 साल में निकाल लिया गया। अब यह कोयला कहां जा रहा है, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। बताया जा रहा है कि यह कोयला विदेशों तक भेजा जा रहा है, जबकि इसी इलाके में स्थित एनटीपीसी जैसे सेंट्रल गवर्नमेंट के पावर प्लांट में भी कोयले की भारी कमी है।
प्रदर्शनकारी आदिवासियों का कहना है कि यह सबसे बड़ा विरोधाभास है — “हमारी जमीन से कोयला निकाला जा रहा है, और हम भूखे-प्यासे अपने अधिकार के लिए तिरंगा लेकर घूम रहे हैं।” यह दृश्य इस बात की गवाही देता है कि विकास की कीमत आज भी स्थानीय आदिवासी समुदाय चुका रहा है।
कोरबा में एसईसीएल (SECL) पर आरोप है कि वह आदिवासी जमीन पर कब्जा कर खनन कर रही है। वहीं प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद इन आदिवासी परिवारों की आवाज अब तक शासन तक नहीं पहुंच सकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि “सरकार कहती है कि वह सबका साथ-सबका विकास चाहती है, लेकिन यहां विकास किसी और की जेब में जा रहा है, और जमीन वालों के हिस्से में सिर्फ धूल और दर्द है।”
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि जब तक उन्हें पुनर्वास और उचित मुआवजा नहीं मिलता, उनका आंदोलन जारी रहेगा।
