छत्तीसगढ़ के गांवों में नशा मुक्ति की अलख: पांच पंचायतों ने शराब-जुए पर लगाया बैन, 50 हजार तक जुर्माना
रायपुर। 78 साल पहले मिली राजनीतिक आजादी के बाद अब देश में “नशे से आजादी” की नई लड़ाई लड़ी जा रही है। महानगरों से लेकर गांवों तक नशे की लत समाज के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां शराब की खपत देश में सबसे अधिक है और अब गांजा व ड्रग्स भी युवाओं को जकड़ रहे हैं, वहां कुछ पंचायतों ने इस चुनौती के खिलाफ मिसाल पेश की है।
बेमेतरा की पांच पंचायतों की पहल
बेमेतरा जिले के बेमेतरा और नवागढ़ विकासखंड की पांच पंचायतों – खम्हरिया, मल्दा, केशला, धोबघट्टी और मगरघटा – ने सामूहिक रूप से साहसिक कदम उठाया है। यहां शराब, जुए और सट्टे पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। नियमों का उल्लंघन करने पर 5 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है।
खम्हरिया पंचायत – रात 10 बजे के बाद बैठकी भी बंद
सरपंच रामदिल निषाद ने बताया कि अवैध शराब और युवाओं की लत से परेशान होकर गांववालों ने 2 महीने पहले कड़ा फैसला लिया। शराब-बिक्री और सेवन दोनों पर रोक लगी। यहां तक कि रात 10 बजे के बाद बिना कारण घूमना और बैठकी करना भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब तक तीन उल्लंघन मामलों में जुर्माना और चेतावनी दी जा चुकी है।
मल्दा पंचायत – शराब, जुआ और डिस्पोजल पर भी रोक
सरपंच मनोज साहू ने बताया कि गांव की पहचान शराब और जुए से खराब हो रही थी। इसलिए पंचायत ने शराब, सट्टा और जुए के साथ-साथ सार्वजनिक स्थानों पर डिस्पोजल और पानी पाउच फेंकने पर भी पाबंदी लगाई। नियम तोड़ने पर 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा।
कान्हरपुर और केशला – ढाबा तक बंद कराया
कान्हरपुर बस्ती के लोगों ने शराब बिक्री पर रोक लगाकर 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया। वहीं, केशला में अवैध रूप से चल रहे ढाबे को ग्रामीणों की मदद से बंद कराया गया, जो नशे का केंद्र बन गया था।
धोबघट्टी और मगरघटा – अभियान का व्यापक असर
खम्हरिया और मल्दा से शुरू हुई मुहिम ने धोबघट्टी और मगरघटा तक असर दिखाया। यहां भी शराब और नशाखोरी पर रोक लगाई गई और उल्लंघन पर 20 से 25 हजार रुपये तक दंड का प्रावधान किया गया।
नशामुक्ति की मिसाल
इन पंचायतों ने साबित कर दिया है कि सामूहिक इच्छाशक्ति से समाज को नशे से मुक्त किया जा सकता है। गांवों की शांति, संस्कृति और स्वच्छता बचाने की दिशा में यह कदम गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने जैसा है।
सरकार और प्रशासन से उम्मीद
इन पंचायतों की पहल को जिला प्रशासन और सरकार से विशेष प्रोत्साहन और प्राथमिकता मिलनी चाहिए, ताकि यह मॉडल अन्य गांवों तक भी पहुंचे और छत्तीसगढ़ के गांव नशा मुक्त होकर स्वच्छ और सुंदर बन सकें।
