स्मार्ट सिटी या गड्ढों की नगरी? रायपुर की सड़कों का हाल बेहाल, बारिश में सड़कें तालाब में तब्दील!

रायपुर। जिले में हाल ही में हुई झमाझम बारिश ने शहर की सड़कों की खस्ता हालत को पूरी तरह उजागर कर दिया है। राजधानी रायपुर, जिसे स्मार्ट सिटी घोषित किया गया है, अब गहरे गड्ढों और टूटे-फूटे मार्गों का शहर बन चुका है। शहर के प्रमुख मार्ग, खासकर भाटागांव और चंगोराभाटा क्षेत्र, गड्ढों और जलभराव की समस्या से जूझ रहे हैं।

भाटागांव में पाइप मरम्मत के लिए सड़क के बीचो-बीच खोदा गया गड्ढा कई दिनों से जस का तस पड़ा है, जिससे रोजाना ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। नगर निगम इस पर आंख मूंदकर बैठा है, जबकि स्थानीय लोग घंटों जाम में फंसकर परेशान हो रहे हैं। यही हाल चंगोराभाटा का है, जो रायपुर मेयर मिनल चौबे के गृहस्थान भी है। यहां आवारा पशुओं का डेरा, गंदगी और जलभराव की वजह से राहगीरों और वाहन चालकों के लिए चलना मुश्किल हो गया है। थोड़ी सी बारिश से पूरे इलाके का नक्शा बदल जाता है।

बारिश के मौसम में पैदल चलना भी दूभर हो गया है। सड़कों पर कीचड़ और जलभराव के कारण वाहन फिसलने और दुर्घटना होने की आशंका लगातार बनी रहती है। सड़क किनारे बने नाले भी जर्जर हो चुके हैं, जिससे गंदगी और मच्छरजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

स्थानीय लोगों की शिकायत के बावजूद प्रशासन और नगर निगम की निष्क्रियता साफ नजर आ रही है। शहर के अन्य हिस्सों में विकास कार्यों पर लाखों खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन भाटागांव, चंगोराभाटा और भनपुरी रेलवे क्रॉसिंग जैसी प्रमुख सड़कें जस की तस जर्जर हैं। हल्की बारिश में ये सड़कें तालाब जैसी हो जाती हैं, और जलभराव से वाहन और पैदल यात्री दोनों जोखिम में रहते हैं।

सड़क हादसों का आंकड़ा भी शहर की सड़कों की दुर्दशा को दर्शाता है। छत्तीसगढ़ में केवल आठ महीनों में 2,960 लोग सड़क हादसों में मारे जा चुके हैं, जबकि 5,650 लोग घायल हुए हैं। तेज रफ्तार और लापरवाही मुख्य कारण माने जा रहे हैं। राजधानी रायपुर और उससे सटे जिलों में सबसे अधिक हादसे हुए हैं, जबकि सबसे ज्यादा मौतें महासमुंद जिले में हुई हैं।

आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी से 31 अगस्त 2025 के बीच रायपुर जिले में 1,347 हादसे हुए, जिसमें 424 लोगों की मौत हुई। दुर्ग जिले में 902 हादसे और 246 मौतें हुईं, जबकि बलौदाबाजार में 462 हादसे और 206 मौतें दर्ज की गईं। बालोद में 368 हादसे और 158 मौतें हुईं। महासमुंद जिले में 366 हादसे हुए, जिनमें 235 लोगों की मौत हुई। पिछले साल की तुलना में मौतों और घायलों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो प्रशासन की अनदेखी को दर्शाता है।

पीडब्ल्यूडी ने रायपुर जिले की कुल 337 किमी सड़क को खराब बताया है और मरम्मत के लिए 110 करोड़ 17 लाख रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा है। लेकिन इस सूची में कई सड़कें शामिल हैं जो पूरी तरह दुरुस्त हैं और जिनमें एक भी गड्ढा नहीं है। वहीं, भाटागांव और भनपुरी जैसी सड़कें, जो प्रतिदिन दुर्घटनाओं का केंद्र बन रही हैं, सूची में शामिल ही नहीं हैं। इस प्रस्ताव से स्पष्ट होता है कि सरकारी नीतियां और मरम्मत के प्राथमिकता निर्धारण में गंभीर भटकाव है।

वर्तमान में मरम्मत सूची में शामिल कुछ सड़कें हैं:

  • फुंडहर-देवपुरी की 1 किमी सड़क, खर्च लगभग 50 लाख।
  • कचना से पिरदा 3 किमी सड़क, खर्च लगभग 1 करोड़।
  • धरमपुरा-वीआईपी 4.50 किमी सड़क, खर्च 2 करोड़ 16 लाख।
  • रायपुर-बिलासपुर भनपुरी चौक से रावांभांठा 5 किमी सड़क, खर्च 1 करोड़ 60 लाख।
  • कचहरी चौक से मोवा ओवरब्रिज 1.60 किमी सड़क, खर्च 1 करोड़ 60 लाख।

इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन वास्तविक जरूरतों और जर्जर सड़कों के बीच प्राथमिकता तय करने में विफल रहा है। सड़कें न केवल वाहन चालकों बल्कि पैदल नागरिकों के लिए भी खतरा बन चुकी हैं। बरसात में जलभराव और कीचड़ के कारण सड़क हादसों का खतरा दोगुना हो जाता है।

नालों की स्थिति भी परेशान करने वाली है। नालों की सफाई नहीं होने के कारण गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे मच्छरजनित बीमारियों का खतरा बढ़ा है। अंधेरे में राहगीरों के गिरने की संभावना भी अधिक हो गई है।

स्थानीय लोगों और राहगीरों की सुरक्षा की अनदेखी यह दर्शाती है कि स्मार्ट सिटी का नाम केवल शहरीकरण और दिखावे तक सीमित रह गया है। सड़क हादसे और दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या प्रशासन की गंभीर विफलता का द्योतक है।

रायपुर की सड़कें अब सरकार की नाकामी का प्रतीक बन चुकी हैं। जनता सड़क सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा की मांग कर रही है, लेकिन सरकारी निकाय सुस्ती और प्राथमिकता तय करने में असमर्थता दिखा रहे हैं।

बारिश और जलभराव से जर्जर हुई रायपुर की सड़कों ने साफ कर दिया है कि प्रशासन ने स्मार्ट सिटी के दावों के बावजूद बुनियादी ढांचे पर ध्यान नहीं दिया। पीडब्ल्यूडी की अधूरी और भ्रामक सूची, जर्जर सड़कें और मरम्मत में देरी यह साबित करती है कि शहरवासियों की सुरक्षा और सुविधा सरकारी प्राथमिकता में शामिल नहीं है। स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की निष्क्रियता के कारण नागरिकों को रोजाना जोखिम उठाना पड़ रहा है। अब समय आ गया है कि सरकार केवल दिखावे के विकास पर ध्यान न दें, बल्कि वास्तविक सड़क सुरक्षा और सड़क निर्माण पर तत्काल कदम उठाए।

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