मानसून सत्र: 9 करोड़ रोज खर्च… रोजाना शुरू होते ही स्थगित हो रही संसद! आखिर कब होगी मुद्दों पर चर्चा?

मानसून सत्र

नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ गया। शुक्रवार को लगातार पांचवें दिन भी लोकसभा और राज्यसभा में सामान्य कामकाज नहीं हो सका। विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की मांग करता रहा, जबकि सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही। नतीजा यह रहा कि राज्यसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक और लोकसभा की बैठक सोमवार, 27 जुलाई तक स्थगित कर दी गई।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल संसद के बाहर बैठा वह आम नागरिक पूछ रहा है, जो टैक्स देकर इस लोकतंत्र को चलाता है।

हर दिन करोड़ों रुपये खर्च… लेकिन चर्चा कितनी?

संसद चलाने में हर दिन करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। विभिन्न सार्वजनिक अनुमानों के अनुसार लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही पर प्रतिदिन लगभग 9 करोड़ रुपये तक का खर्च बैठता है। यानी हर घंटे करीब 1.5 करोड़ रुपये और हर मिनट लाखों रुपये जनता की जेब से खर्च होते हैं।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि लगातार कई दिनों तक सदन में कोई सार्थक चर्चा ही नहीं हो पाती, तो इस खर्च की जवाबदेही आखिर किसकी है?

लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए या सिर्फ नारे?

संसद का उद्देश्य सरकार और विपक्ष के बीच संवाद, सवाल-जवाब और कानून निर्माण है। सत्ता पक्ष का दायित्व है कि वह सदन चलाने का प्रयास करे, वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह जनता के मुद्दे प्रभावी ढंग से उठाए। यदि दोनों पक्ष टकराव की स्थिति में ही बने रहें और सदन बार-बार स्थगित होता रहे, तो नुकसान अंततः जनता का होता है।

जनता के मन में उठ रहे सवाल

देश के कई नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं—

क्या संसद में महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का रास्ता नहीं निकल सकता?
क्या बार-बार स्थगन ही एकमात्र विकल्प है?
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि सदन नहीं चलता, तो इसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
क्या राजनीतिक दलों को जनता के धन और समय की भी उतनी ही चिंता है, जितनी राजनीतिक रणनीति की?

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पांच दिनों से जारी गतिरोध

मानसून सत्र की शुरुआत से ही विभिन्न मुद्दों को लेकर दोनों सदनों में व्यवधान बना हुआ है। लगातार कई दिनों तक लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही प्रभावित रही, जिससे विधायी कार्य और अन्य निर्धारित एजेंडा आगे नहीं बढ़ सका।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद

लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सदन के भीतर बहस करें, सवाल पूछें और जवाब दें। संसद जितनी अधिक चलेगी, उतना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा मजबूत होगा। लेकिन यदि कार्यवाही लगातार बाधित होती रही, तो सबसे बड़ा नुकसान उन नागरिकों का होगा जिनके टैक्स के पैसे से यह पूरी व्यवस्था संचालित होती है।

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