डोंगरगढ़ में फिर तेंदुए की मौत: वन विभाग ने बताया नेचुरल डेथ; पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पहले दाह संस्कार पर सवाल…
डोंगरगढ़ में फिर तेंदुए की मौत
डोंगरगढ़: राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ वन परिक्षेत्र में एक बार फिर तेंदुआ मृत अवस्था में मिलने से हड़कंप मच गया है। रानीगंज क्षेत्र में सामने आई इस घटना ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ही क्षेत्र में बार-बार हो रही तेंदुओं की मौतों और हर मामले में विभाग द्वारा इसे प्राकृतिक मृत्यु बताने से स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों की चिंताएँ बढ़ती जा रही हैं।
लगातार मौतें, वही पुराना दावा
वन विभाग ने तेंदुए की मौत का कारण आंतरिक चोट (इंटरनल इंजरी) बताया है। पोस्टमार्टम के बाद तेंदुए का दाह संस्कार भी कर दिया गया। डीएफओ आयुष जैन ने इसे प्राकृतिक मृत्यु करार दिया है। हालांकि सवाल यह उठ रहे हैं कि यदि मौत स्वाभाविक थी, तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई और दाह संस्कार में इतनी जल्दबाज़ी क्यों दिखाई गई। एक ही वन क्षेत्र में लगातार तेंदुओं की मौतें डोंगरगढ़ को तेंदुओं के लिए एक ‘डेथ ज़ोन’ की तरह दर्शा रही हैं।
अवैध शिकार की आशंका
स्थानीय लोगों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इलाके में अवैध शिकार, करंट लगाकर शिकार और जहरीले चारे जैसी गतिविधियों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद वन विभाग की गश्त और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। हर मौत के बाद बिना ठोस जांच के ‘प्राकृतिक मृत्यु’ बताना विभाग की विश्वसनीयता पर भी असर डाल रहा है।
हाईकोर्ट के निर्देशों पर सवाल
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही वन्यजीवों की संदिग्ध मौतों को लेकर सख्त निर्देश जारी कर चुका है। कोर्ट ने पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और वन्यजीव सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही थी। लेकिन डोंगरगढ़ में हो रही घटनाएँ बताती हैं कि इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर अब तक प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक न करना और जांच में देरी इस आशंका को और गहरा करता है।
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स्थानीय लोगों की नाराज़गी
स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों का आरोप है कि कमजोर निगरानी, ढीली गश्त और प्रभावी इंटेलिजेंस सिस्टम की कमी के चलते ऐसी घटनाएँ बार-बार हो रही हैं। उनका कहना है कि यदि स्वतंत्र एजेंसी से जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक करने और हाईकोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में इस क्षेत्र में वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।
प्राकृतिक मौत या सच्चाई पर पर्दा?
तेंदुए की ताज़ा मौत ने एक बार फिर वन विभाग के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह वास्तव में प्राकृतिक मौत है, या फिर हर बार की तरह ‘प्राकृतिक मृत्यु’ के नाम पर सच्चाई को दबाया जा रहा है? अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
