Humanitarian Crisis in Gaza: गाजा में मानवीय संकट गहराया, भुखमरी की चपेट में लाखों लोग, UN चिंतित
Humanitarian Crisis in Gaza: ग़ाज़ा में जारी जंग अब सिर्फ सरहदों की लड़ाई नहीं रही, यह अब पेट और जान की लड़ाई में तब्दील हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देश और दुनिया भर की संस्थाएं ग़ाज़ा की बिगड़ती मानवीय स्थिति को लेकर गहरी चिंता जता रहे हैं, लेकिन जमीनी हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं।
खाली गोदाम, बंद किचन, और भूख से मरते लोग
UN के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग़ाज़ा से महज़ 40 किलोमीटर दूर इज़राइल, मिस्र और जॉर्डन के गोदामों में जरूरी खाद्य सामग्री भरी पड़ी है, लेकिन ग़ाज़ा के अंदर WFP के गोदाम खाली हैं। कभी जिन रसोइयों में सैकड़ों लोगों के लिए खाना बनता था, वो अब बंद पड़े हैं। बेकरियां ठप हो चुकी हैं और दान पर चलने वाले कम्युनिटी किचन भी अब बंद हो चुके हैं।
WFP के डायरेक्टर एंटोनी रेनार्ड के मुताबिक, पहले जहां 10 लाख लोगों को खाना पहुंचाया जाता था, अब मुश्किल से 2 लाख लोगों तक राहत पहुंच पा रही है।
जब भूख जान लेने लगे, तो जंग का मतलब बदल जाता है
ग़ाज़ा में अब बमों से पहले भूख जान ले रही है। राहत सामग्री लेकर पहुंचने वाले ट्रकों को देखकर लोगों की उम्मीदें जागती हैं, लेकिन जैसे ही ट्रक ग़ाज़ा पहुंचते हैं, भूख से बेहाल भीड़ उन्हें घेर लेती है। राहत का सामान—चावल, पानी, दवाइयां—पल भर में लूट लिया जाता है। कई बार इस अफरा-तफरी में लोगों की जान भी चली जाती है।
यहां बच्चों के पास खाने को रोटी नहीं है, माओं के पास आंसू नहीं और बड़ों के पास कोई उम्मीद बाकी नहीं। भूख अब सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र और दुनिया की अपीलें, लेकिन इज़राइल अडिग
UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इज़राइल से अपील की है कि कम से कम राहत सामग्री के ट्रकों को ग़ाज़ा में प्रवेश की अनुमति दी जाए। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। बीते शुक्रवार को इज़राइली हमलों में कम से कम 71 लोग मारे गए और कई घायल हुए।
UN की रिपोर्ट बताती है कि ग़ाज़ा में करीब 5 लाख लोग भुखमरी की कगार पर हैं और अगर हालात नहीं बदले, तो करीब 21 लाख लोग अकाल जैसी स्थिति में पहुंच सकते हैं।
नेतन्याहू का रुख सख्त, मानवीय अपीलों का असर नहीं
इन विकट परिस्थितियों के बावजूद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपने रुख पर कायम हैं। 13 मई को दिए बयान में उन्होंने साफ कहा कि उनका मकसद हमास को पूरी तरह खत्म करना है और इसके लिए यह युद्ध जारी रहेगा, भले ही मानवीय संगठनों की अपीलें आती रहें।
अब सवाल सिर्फ जंग का नहीं, इंसानियत का है
ग़ाज़ा की मौजूदा स्थिति एक कड़वा सवाल खड़ा करती है—जब अस्पताल, स्कूल और शरणार्थी कैंप मलबे में तब्दील हो जाएं, जब रोटी से पहले रॉकेट बरसने लगें, तो असली निशाना क्या है?
यह लड़ाई अब हथियारों की नहीं, इंसानियत की परीक्षा बन चुकी है। और जब लड़ाई रोटी-पानी के लिए हो, तो उसका हल गोली नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना से निकलता है।
