20 साल तक कमरे में बंद रही लिसा, अब आजादी मिली तो सिख रही जीना
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के बकावंड गांव की 26 वर्षीय लिसा की कहानी इंसानियत और भय का गहरा मिश्रण है। छह साल की उम्र में अपने पिता द्वारा सुरक्षा के नाम पर बंद कमरे में कैद की गई लिसा ने पूरी दुनिया को नहीं देखा। बीस साल तक अंधेरे और तन्हाई के बीच बिताए गए समय ने उसकी दृष्टि और मानसिक स्थिति पर गहरा असर डाला।
कैद का जीवन
लिसा जब छह साल की थी, तभी उसके पिता ने उसे बाहर की दुनिया से अलग कर दिया। परिवार की चिंता यह थी कि कोई शातिर व्यक्ति बच्ची को नुकसान पहुंचा सकता है। पिता की मंशा सही थी—बच्ची को सुरक्षित रखना। लेकिन सुरक्षा की कोशिश अंधेरे और मानसिक पीड़ा में बदल गई।
लिसा का पूरा जीवन एक छोटे, अंधे कमरे में सीमित हो गया। इस कमरे में न खिड़की थी, न रोशनी, न हवा। वहां वह खाती, सोती, नहाती और गुज़र-बसर करती। उसके लिए यही पूरा संसार बन गया।
बीस साल बाद रेस्क्यू
सामाजिक कल्याण विभाग की टीम ने हाल ही में लिसा को कमरे से बाहर निकाला। उस समय उसकी आंखों की रोशनी कमजोर हो चुकी थी, आवाज़ भी दब चुकी थी और मानसिक स्वास्थ्य गंभीर स्थिति में था। उसे तत्काल घरौंदा आश्रम में रखा गया, जहाँ उसका शारीरिक और मानसिक परीक्षण हुआ।
उप निदेशक सुचित्रा लाकरा ने बताया,
“लड़की मानसिक रूप से परेशान थी। छह साल की उम्र से वह पूरी तरह अकेली थी। बाहर की दुनिया से उसका कोई संपर्क नहीं था। कमरे में सारे काम किए जाते थे और वह डर के कारण लोगों से नहीं मिलती थी। रेस्क्यू के समय वह बहुत डर रही थी। अब आश्रम में धीरे-धीरे खाना खुद खा रही है, नहाना सीख रही है और बातचीत करना भी सीख रही है।”
डॉक्टरों की स्थिति
डॉक्टरों का कहना है कि लिसा की आंखों की रोशनी शायद पूरी तरह वापस न आए, लेकिन सही देखभाल और समाज का समर्थन उसे नई जिंदगी दे सकता है।
समाजिक और कानूनी पहलू
सामाजिक कल्याण विभाग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच शुरू कर दी है। वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इतनी लंबी कैद के दौरान कितनी उपेक्षा हुई और क्या यह मानवाधिकार उल्लंघन का मामला बनता है। प्रशासन ने भी कहा कि जांच रिपोर्ट आने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।
नई शुरुआत की ओर कदम
अब लिसा धीरे-धीरे अपने डर को छोड़ रही है। वह मुस्कुराना सीख रही है, लोगों पर भरोसा करना सीख रही है और सबसे महत्वपूर्ण, जीवन का अनुभव लेना फिर से सीख रही है।
यह कहानी यह दिखाती है कि डर और भयानक परिस्थितियों के बावजूद सही देखभाल और समाज के समर्थन से इंसान को नई शुरुआत करने का मौका मिल सकता है।
