Donald Trump Trade Policy Explained: ट्रेड वॉर या पावर प्ले? ट्रंप की आक्रामक आर्थिक चाल से दुनियाभर में भूचाल, समझिए अब तक क्या- क्या हुआ

Donald Trump Trade Policy Explained: कभी 25%, कभी 50%, और अब 15% , टैरिफ की दरों में बार-बार हो रहे बदलाव ने दुनिया भर के कारोबारियों और सरकारों को असमंजस में डाल दिया है। एक दिन सख्ती का ऐलान होता है, दूसरे दिन नरमी का संकेत मिल जाता है। इन फैसलों ने साफ कर दिया है कि मामला सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि रणनीति और दबाव की राजनीति का भी है।

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump की आक्रामक आर्थिक नीति ने कई देशों के साथ रिश्तों में खटास पैदा की। बढ़ते टैरिफ से आयात महंगा हुआ, बाजारों में उतार-चढ़ाव आया और जवाबी कार्रवाई की आशंका भी बढ़ी। सवाल यही है, क्या यह सच में ट्रेड वॉर है, या फिर वैश्विक मंच पर ताकत दिखाने का पावर प्ले?

आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि इन फैसलों के पीछे की सोच क्या रही और अब तक हालात किस मोड़ पर पहुंच चुके हैं।

Table of Contents:

  1. ट्रंप का पहला कार्यकाल (2017–2021)
  2. जब ट्रंप शासन से हटें
  3. अमेरिका-भारत टैरिफ विवाद की शुरुआत
  4. भारत की रणनीति
  5. अमरीकी अदालत का फैसला

ट्रेड वॉर की शुरुआत: “अमेरिका फर्स्ट” नीति

अमेरिका की राजनीति में जब भी “अमेरिका फर्स्ट” की बात होती है, तो सबसे पहले नाम आता है डोनाल्ड ट्रंप का। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल (2017–2021) के दौरान जिस तरह से टैरिफ यानी आयात शुल्क को हथियार बनाकर ट्रेड वॉर शुरू किया, उसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया। यह सिर्फ अमेरिका और चीन की लड़ाई नहीं थी, बल्कि इसका असर भारत समेत कई देशों पर पड़ा।

2016 के चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन और अन्य देश अमेरिका का फायदा उठा रहे हैं। उनका कहना था कि अमेरिका का ट्रेड डेफिसिट बहुत बढ़ गया है, खासकर चीन के साथ।

राष्ट्रपति बनने के बाद 2018 में ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए स्टील और एल्युमिनियम पर भारी टैरिफ लगा दिया। इसके बाद असली टकराव शुरू हुआ।

China के साथ सीधी टक्कर

2018 में अमेरिका ने चीन से आयात होने वाले अरबों डॉलर के सामान पर 25% तक टैरिफ लगा दिया। जवाब में चीन ने भी अमेरिकी कृषि उत्पादों, खासकर सोयाबीन और मक्का पर शुल्क बढ़ा दिया।

देखते ही देखते यह आर्थिक जंग बढ़ती चली गई। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर सैकड़ों अरब डॉलर के सामान पर टैरिफ लगाए।

2020 में “फेज वन डील” हुई, जिसमें चीन ने अमेरिका से अधिक कृषि और ऊर्जा उत्पाद खरीदने का वादा किया, लेकिन पूरी तरह से तनाव खत्म नहीं हुआ।

वैश्विक असर: दुनिया की अर्थव्यवस्था पर झटका

ट्रेड वॉर का असर सिर्फ अमेरिका-चीन तक सीमित नहीं रहा। ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हुई, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी, निवेशकों का भरोसा डगमगाया, कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन से उत्पादन हटाकर वियतनाम, मेक्सिको और भारत जैसे देशों की ओर रुख किया

कोविड-19 महामारी ने इस संकट को और गहरा कर दिया।

हालांकि ये समय भारत के लिए फायदेमंद साबित हुआ, चीन पर टैरिफ बढ़ने से कई कंपनियां चीन से बाहर निकलने लगीं। भारत ने इसे अवसर के रूप में देखा। “मेक इन इंडिया” और PLI स्कीम के जरिए सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने की कोशिश की। जिससे भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण और फार्मा सेक्टर को फायदा हुआ।

लेकिन 2019 में ट्रंप प्रशासन ने भारत का GSP (Generalized System of Preferences) स्टेटस खत्म कर दिया। इससे भारतीय निर्यातकों को मिलने वाली टैरिफ छूट समाप्त हो गई। अमेरिका ने आरोप लगाया कि भारत अपने बाजार को American Goods के लिए ठीक से नहीं खोल रहा।

क्या ट्रेड वॉर से ट्रंप की मंशा सफल रही?

ट्रंप का दावा था कि टैरिफ से अमेरिकी उद्योग मजबूत होगा और चीन पर दबाव पड़ेगा। लेकिन टैरिफ का बोझ अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ा। उत्पाद महंगे हुए और किसानों को नुकसान झेलना पड़ा।


जब ट्रंप शासन से हटें

ट्रंप के बाद राष्ट्रपति Joe Biden ने कई टैरिफ को बरकरार रखा। इसका मतलब यह है कि अमेरिका-चीन के बीच प्रतिस्पर्धा सिर्फ ट्रंप तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक लंबी रणनीतिक लड़ाई का हिस्सा है।


2025 में अमेरिका-भारत टैरिफ विवाद की शुरुआत

2025 में सत्ता में वापसी के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से “अमेरिका फर्स्ट” नीति को आक्रामक अंदाज़ में लागू किया। इस बार टैरिफ सिर्फ चीन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि भारत सहित कई बड़े व्यापारिक साझेदारों पर भी व्यापक शुल्क लगाए गए।

अप्रैल 2025:

अमेरिका ने “रेसिप्रोकल टैरिफ” के नाम पर कई देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया। भारत पर कुल 26% (10% बेस + 16% अतिरिक्त) तक प्रभावी शुल्क।

इसके पीछे ट्रंप ने तर्क दिया कि इससे अमेरिका का व्यापार घाटा कम होगा। इस कदम ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई और सप्लाई चेन पर दबाव डाला।

जुलाई 2025: 

भारत पर टैरिफ बढ़ाकर लगभग 25% किया गया।

अगस्त 2025: 

रूस से तेल खरीद के मुद्दे को आधार बनाकर अतिरिक्त 25% “पेनल्टी टैरिफ” जोड़ा गया। जिसके बाद भारत पर कुल टैरिफ 50% तक पहुंचा।

इससे भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, लेदर, इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर्स बुरी तरह प्रभावित हुए। अमेरिका भारत का बड़ा निर्यात बाज़ार होने से निर्यातकों में अनिश्चितता बढ़ी।

भारत की रणनीति: जवाबी टैरिफ नहीं, बातचीत पर जोर

जब Donald Trump प्रशासन ने भारत पर 2025 में सख्त टैरिफ लगाए, तब नई दिल्ली ने तुरंत जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय बातचीत और अंतरिम व्यापार ढांचे (Interim Framework) का रास्ता चुना। सरकार का तर्क था कि सीधे टकराव से भारतीय निर्यातकों पर और बोझ बढ़ेगा, जबकि वार्ता से चरणबद्ध राहत मिल सकती है।

लेकिन इसी रणनीति को लेकर देश के भीतर राजनीतिक बहस तेज हो गई।

कई लोगों का कहना था कि सरकार को मजबूत प्रतिशोधी कदम उठाने चाहिए थे। सवाल उठने लगे कि जब भारत पर 26% से 50% तक प्रभावी टैरिफ का दबाव बना, तो समान अनुपात में जवाबी शुल्क क्यों नहीं लगाया गया? क्या भारत अमेरिकी दबाव में झुक रहा है? क्या इससे भविष्य में अमरिका को और सख्त शर्तें थोपने का संदेश नहीं जाएगा?

सबसे ज़्यादा राजनीतिक हलचल तब मची जब Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया कि भारत रूस से तेल खरीद कम करेगा। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि अगर भारत अमेरिका की बात मानता है तो टैरिफ में राहत दी जाएगी। जिसके बाद 25% लगने वाले टैरिफ को घटाकर 18% किया गया। तो वहां भारत ने अमेरिका पर 0% टैरिफ कर दिया।

मोदी सरकार ने इसे “कूटनीतिक सफलता” बताया—यह कहते हुए कि 50% जैसी कठोर दर से 18% तक आना बड़ा सुधार है और इससे निर्यातकों को राहत मिली। लेकिन इससे मोदी सरकार की खूब आलोचना हुई।

अगर पहले 0% या बहुत कम शुल्क था और वह 50% तक गया, फिर 18% पर आया—तो इसे उपलब्धि कैसे माना जाए?

Rahul Gandhi सहित कई विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार अमेरिकी दबाव में झुक रही है।

कुछ आलोचकों ने तो यह तक कहा कि अंतरराष्ट्रीय विवादों और तथाकथित “एप्सटीन फाइल्स” जैसे मुद्दों में नाम उछाले जाने की अटकलों से प्रधानमंत्री दबाव में हैं.


धमकियों का दायरा

ट्रंप प्रशासन ने भारत के साथ अन्य देशो कौनसंकेत दिया कि जो देश अमेरिकी शर्तों पर व्यापार समझौते नहीं करेंगे, उन पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा।

BRICS देशों को डॉलर व्यवस्था और वैकल्पिक भुगतान तंत्र पर चेतावनी दी। यूरोप, कनाडा, मेक्सिको और एशियाई साझेदारों पर भी सख्त रुख दिखाया।

संदेश साफ था, टैरिफ को कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा।


कोर्ट का फैसला और उसके बाद ट्रंप का रुख

Trade War में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब फरवरी 2026 में Supreme Court of the United States ने ट्रंप सरकार के बड़े टैरिफ फैसलों पर रोक लगा दी, तो लगा कि अब ट्रेड वॉर धीमा पड़ जाएगा। कोर्ट ने कहा कि आपातकालीन कानून के तहत इतने बड़े स्तर पर टैरिफ लगाना सही नहीं था। यह ट्रंप के लिए बड़ा झटका माना गया।

यह भी पढ़ें: US Supreme Court on Trump Tariff: ट्रेड वॉर पर ब्रेक, ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका

लेकिन Donald Trump ने तुरंत नया रास्ता निकाल लिया। उन्होंने दूसरे कानून का सहारा लेकर पहले 10% और फिर 15% का सभी देशों पर एक समान टैरिफ लगा दिया। यानी पुराने 26% या 50% जैसे टैरिफ भले रुक गए, लेकिन उनकी जगह 15% का नया ग्लोबल टैरिफ आ गया।

सीधे शब्दों में समझें तो कोर्ट के फैसले से टैरिफ खत्म नहीं हुए, बस उनका तरीका बदल गया। अब 15% का टैरिफ लगाकर अमेरिका ने दबाव भी बनाए रखा और बातचीत के लिए नया माहौल भी तैयार कर दिया।

निष्कर्ष

डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ ट्रेड वॉर सिर्फ एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई बन गई है।

इसने यह साफ कर दिया कि 21वीं सदी में आर्थिक हथियार -जैसे टैरिफ और सप्लाई चेन कंट्रोल -भी उतने ही ताकतवर हैं जितने सैन्य हथियार।

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