‘आरक्षण की लिमिट तोड़नी होगी’: जाति जनगणना से पहले ही कांग्रेस ने PM मोदी से कर दी तीन मांगें, सरकार ने साधी चुप्पी

नई दिल्ली: देश में जातिगत जनगणना की बहस अब तेज हो चुकी है, और इसी कड़ी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर तीन बड़े कदम उठाने की मांग की है। खरगे ने यह पत्र ऐसे समय में लिखा है जब केंद्र सरकार ने पहली बार जातिगत जनगणना को लेकर सहमति जताई है।
खरगे ने प्रधानमंत्री को जातिगत जनगणना शुरू होने से पहले ही तीन अहम मुद्दों पर कदम उठाने का सुझाव दिया है, जिसमें शामिल हैं:

कांग्रेस की तीन मांगें:

आरक्षण की 50% सीमा को संविधान संशोधन के जरिए खत्म करना।

राज्यों द्वारा पारित आरक्षण को तमिलनाडु मॉडल की तर्ज पर संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करना।

निजी शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करना।

तेलंगाना मॉडल पर जोर: क्यों खास है खरगे का सुझाव:

खरगे ने अपने पत्र में विशेष रूप से तेलंगाना में किए गए हालिया जातिगत सर्वेक्षण का उल्लेख किया और कहा कि जनगणना की प्रश्नावली सामाजिक-आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन की जानी चाहिए। उनका मानना है कि जातिगत आंकड़े केवल संख्या के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानता की पहचान और उसके समाधान के लिए सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

निजी संस्थानों में आरक्षण: अब तक क्या हुआ?

खरगे ने अपने पत्र में 2006 में जोड़े गए संविधान के अनुच्छेद 15(5) का हवाला दिया, जिसे 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। इस प्रावधान के तहत निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की अनुमति है, लेकिन अब तक इसका समुचित क्रियान्वयन नहीं हुआ है। खरगे ने यह भी बताया कि संसद की स्थायी समिति ने हाल ही में, 25 मार्च को, इस विषय में नया कानून लाने की सिफारिश की थी।

खरगे का पलटवार: ‘जाति जनगणना सामाजिक न्याय का मुद्दा है’:

खरगे ने प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि उन्होंने 16 अप्रैल 2023 को भी इसी विषय पर पत्र लिखा था, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। अब जबकि सरकार खुद जाति जनगणना की बात कर रही है, तो उसे सिर्फ औपचारिकता न मानते हुए ठोस कदम उठाने चाहिए।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस पत्र को साझा करते हुए कहा कि “प्रधानमंत्री ने जाति जनगणना पर अचानक यू-टर्न लिया है। खरगे जी ने अपने पत्र में तीन स्पष्ट और ठोस सुझाव दिए हैं, जिनपर अमल बेहद ज़रूरी है।”

सरकार की चुप्पी :

खरगे के इस पत्र को लेकर अब देशभर में चर्चा शुरू हो चुकी है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जाति आधारित जनगणना जैसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दे पर केंद्र सरकार आगे क्या रुख अपनाती है।

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