1953 के शहीदों की पुण्यतिथि पर जलाए हजारों दीये, अब विधानसभा की मांग ने लिया आंदोलन का रूप

खैरागढ़: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई क्षेत्र में 1953 के ऐतिहासिक गोलीकांड की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम गुरुवार शाम एक नए आंदोलन का संकेत बन गया। शहीदों की स्मृति में जलाए गए हजारों दीयों की रोशनी में छुईखदान की जनता ने एक स्वर में मांग उठाई कि भले ही जिले के नाम से छुईखदान हटा दिया जाए, लेकिन छुईखदान को विधानसभा का दर्जा हर हाल में मिलना चाहिए।

कार्यक्रम में दिखी अपार जनसैलाब

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग जुटे। मंच से सिर्फ अतीत की शहादत को याद नहीं किया गया, बल्कि भविष्य की लड़ाई का ऐलान भी हुआ। इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि यहां किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं दिखा। भाजपा, कांग्रेस सहित विभिन्न दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक बिना दलगत पहचान के, सिर्फ क्षेत्र के अधिकार की मांग को लेकर एक मंच पर नजर आए। इसी एकजुटता ने कार्यक्रम को आंदोलन का रूप दे दिया।

जिला बनने के बाद भी उपेक्षा की शिकायत

स्थानीय लोगों का कहना है कि खैरागढ़-छुईखदान-गंडई को मिलाकर जिला बनाना भले ही राजनीतिक उपलब्धि मानी गई हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। जिला बनने के बाद भी छुईखदान और गंडई में न तो प्रशासनिक सुविधाएं बढ़ीं और न ही विकास की रफ्तार तेज हुई। बड़े कार्यालय, अधिकारी और संसाधन आज भी खैरागढ़ तक सीमित हैं, जबकि बाकी क्षेत्रों को केवल नाम का जिला मिला है।

लोगों का तर्क है कि खैरागढ़ से छुईखदान की दूरी करीब 15 किलोमीटर है, जबकि गंडई और भी दूर स्थित है। ऐसे में एक ही प्रशासनिक ढांचे में तीनों को बांधना शुरू से ही अव्यवहारिक रहा है। प्रशासन तक पहुंच कठिन है और विकास कार्य सुस्त गति से चल रहे हैं।

विधानसभा दर्जा ही एकमात्र समाधान

इसी नाराजगी ने अब एक स्पष्ट मांग का रूप ले लिया है। छुईखदान के लोगों का कहना है कि यदि जिले के नाम से उनका नाम हटाया जाता है तो भी उन्हें आपत्ति नहीं, लेकिन उनकी पहचान और आवाज खत्म नहीं होनी चाहिए। विधानसभा का दर्जा मिलने से ही क्षेत्र की समस्याएं सीधे विधानसभा तक पहुंचेंगी और यही छुईखदान की सबसे बड़ी जरूरत है।

1953 के गोलीकांड की याद में जले दीये

1953 में अधिकारों के लिए शहादत देने वाले शहीदों की स्मृति में जले दीयों ने आज नई पीढ़ी को संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया है। मंच से यह संदेश भी साफ दिया गया कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की अनदेखी के खिलाफ है। लोगों ने चेतावनी दी कि अब छुईखदान सिर्फ आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगा। यदि उनकी आवाज नहीं सुनी गई, तो यह शांत रोशनी जल्द ही एक बड़े आंदोलन में बदल सकती है।

आंदोलन की शुरुआत

कार्यक्रम के दौरान हजारों लोगों ने नारे लगाए- “छुईखदान विधानसभा दो, हमारी आवाज सुनो”, “शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ न जाए”। विहिप और बजरंग दल जैसे संगठनों ने भी इस मांग का समर्थन किया है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि यह मांग अब क्षेत्रीय स्तर से ऊपर उठकर राज्य स्तरीय मुद्दा बनने वाली है।

जिला प्रशासन ने अभी तक इस मांग पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। सूत्रों के अनुसार, विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन और जिला गठन से जुड़े मुद्दे राज्य स्तर पर विचाराधीन हैं। स्थानीय विधायक और सांसदों से इस मुद्दे पर चर्चा की जा सकती है।

1953 का गोलीकांड क्या था?

1953 में छुईखदान क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने भूमि सुधार और अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन किया था। पुलिस कार्रवाई में कई लोग शहीद हुए थे। यह घटना आज भी क्षेत्र की पहचान और संघर्ष का प्रतीक बनी हुई है।

अब छुईखदान की यह नई मांग राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकती है। विधानसभा का दर्जा मिलने से क्षेत्र को अलग पहचान और प्रतिनिधित्व मिलेगा। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग को लेकर आगे बढ़ेंगे, लेकिन अब पीछे नहीं हटेंगे।

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