छत्तीसगढ़ में 74 लाख टन धान रिकॉर्ड में मौजूद, जमीनी हकीकत में गायब! सरकार सख्त, सोसायटियों को नोटिस
रायपुर: छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन 2024-25 के दौरान खरीदे गए 149 लाख मीट्रिक टन धान में से 74 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान सरकारी रिकॉर्ड में तो मौजूद है, लेकिन जमीनी स्तर पर उपार्जन केंद्रों से गायब बताया जा रहा है। यह खुलासा तब हुआ जब मार्कफेड के रिकॉर्ड में धान अब भी शेष दिखाया जा रहा है, जबकि स्थानीय स्तर पर भंडारण केंद्रों में वह धान नहीं मिल रहा।
अब सरकार ने इस गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाया है, और संबंधित सोसायटी प्रबंधकों को नोटिस जारी कर दिए गए हैं।
कलेक्टरों ने तेज की रिकवरी प्रक्रिया
जिन सहकारी समितियों (सोसायटियों) में धान की कमी पाई गई है, वहां प्रबंधकों को नोटिस भेजकर उनसे धान की भरपाई या बराबर की राशि जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसा नहीं करने पर FIR की चेतावनी दी गई है।
सूत्रों के अनुसार, कुछ सोसायटी संचालक अपनी जेब से नुकसान की भरपाई कर रहे हैं। वहीं रायपुर जिले में कई प्रबंधकों ने हाईकोर्ट की शरण ली है। उनका तर्क है कि सरकार ने तय समय पर धान का परिवहन नहीं कराया, जिससे गर्मी में धान सूख गया और उसका वजन घट गया, या बारिश में भीगकर नष्ट हो गया।
केवल 6 जिलों से हुआ पूरा धान उठाव
राज्य के 33 जिलों में से केवल 6 जिलों — बस्तर, दंतेवाड़ा, जांजगीर-चांपा, धमतरी, कोरिया और सरगुजा — में ही धान का पूरा उठाव हुआ है। बाकी जिलों में धान केवल आंकड़ों में दर्ज है, जबकि स्थल पर मौजूद नहीं।
क्या है पूरा मामला?
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धान खरीदी: 149 लाख मीट्रिक टन (खरीफ 2024–25)
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कीमत: ₹3100 प्रति क्विंटल (MSP + प्रोत्साहन राशि)
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रिकॉर्ड में बकाया: 74,268 मीट्रिक टन से अधिक
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सवाल: यह धान कहां गया?
गायब हुआ या नष्ट हो गया?
यह 74 लाख टन से अधिक धान उपार्जन केंद्रों में असल में मौजूद नहीं है। माना जा रहा है कि:
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गर्मी में सूखने से वजन घटा
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बारिश में खराब होकर सड़ गया
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या भंडारण की लापरवाही के चलते नष्ट हो गया।
इस वजह से अब सरकार सोसायटी प्रबंधकों से जवाब मांग रही है और नुकसान की वसूली के लिए कदम उठा रही है।
