नक्सल पीड़ितों की गुहार: सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी का विरोध, सांसदों से समर्थन न करने की अपील

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में शुक्रवार को बस्तर से आए नक्सल पीड़ितों ने प्रेस वार्ता कर अपनी व्यथा देश के सामने रखी। बस्तर शांति समिति के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों ने उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी का विरोध करते हुए सभी सांसदों से उन्हें समर्थन न देने की अपील की।

पीड़ितों ने कहा कि सुदर्शन रेड्डी ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे जनांदोलन ‘सलवा जुडूम’ पर प्रतिबंध लगाया था। उनके अनुसार इस फैसले से माओवादियों को दोबारा पनपने का मौका मिला और बस्तर में हिंसा का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक थमा नहीं है।

कार्यक्रम में मौजूद सियाराम रामटेके ने आक्रोशित लहजे में कहा कि यदि सलवा जुडूम पर रोक नहीं लगाई गई होती, तो शायद वह नक्सली हमले का शिकार नहीं होते। उन्होंने बताया कि एक साधारण किसान होने के बावजूद उन पर माओवादियों ने गोलियां चलाईं और पत्थरों से वार किया। किसी तरह जिंदा बच जाने के बाद अब वह दिव्यांग जीवन जीने को मजबूर हैं।

इसी तरह केदारनाथ कश्यप ने भावुक होकर बताया कि सलवा जुडूम बंद होने के बाद ही माओवादियों ने उनके भाई की नृशंस हत्या की। उन्होंने कहा कि नक्सलियों ने उनके भाई का पेट चीर कर अंग बाहर निकाल दिए थे। कश्यप का मानना है कि यदि 2011 में यह फैसला नहीं आया होता, तो 2014 तक उनके इलाके से नक्सली भाग चुके होते और उनका भाई आज जीवित होता।

कार्यक्रम में शहीद जवान मोहन उइके की विधवा आरती ने भी अपनी पीड़ा साझा की। उन्होंने बताया कि सलवा जुडूम पर प्रतिबंध के बाद ही उनके पति को एम्बुश लगाकर माओवादियों ने मार डाला। उस समय उनकी गोद में तीन महीने की बच्ची थी, जिसने कभी अपने पिता का चेहरा भी नहीं देखा। आज वही बच्ची दस साल की हो चुकी है और अपनी मां के साथ सांसदों से न्याय की गुहार लगाने पहुंची थी।

दंतेवाड़ा के चिंगावरम बस हमले के पीड़ित महादेव दूधी ने टूटी-फूटी हिंदी और गोंडी में बताया कि किस तरह माओवादियों ने यात्री बस को निशाना बनाया, जिसमें 32 निर्दोष लोग मारे गए। इस हमले में उन्होंने अपना एक पैर खो दिया और अब अपाहिज जीवन जी रहे हैं।

प्रेस वार्ता के दौरान बस्तर शांति समिति के जयराम और मंगऊ राम कावड़े ने कहा कि दिल्ली पहुंचे ये पीड़ित अपनी पीड़ा और संघर्ष की कहानी लेकर आए हैं। उन्होंने बताया कि समिति की ओर से सभी सांसदों को पत्र लिखकर यह अपील की गई है कि वे सुदर्शन रेड्डी का समर्थन न करें। उनका कहना है कि बस्तर के हजारों परिवार सलवा जुडूम पर प्रतिबंध के बाद नक्सल आतंक से बुरी तरह प्रभावित हुए और अब वही जख्म एक बार फिर हरे हो रहे हैं।

बस्तर शांति समिति ने साफ कहा कि उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में ऐसे व्यक्ति का चयन बस्तर के पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। इसलिए देश के सांसदों को उनका समर्थन करने से पहले इन पीड़ित परिवारों की व्यथा और बलिदान को जरूर याद रखना चाहिए।

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