बलरामपुर घटना पर सवाल : थार में गुर्गों संग माइनिंग एरिया क्यों पहुंचे SDM? साथ में अधिकारी के बजाय प्राइवेट लोग साथ क्यों थे?
बलरामपुर में अवैध उत्खनन कार्रवाई के दौरान बड़ा बवाल
बलरामपुर: जिले के कुसमी ब्लॉक के हंसपुर गांव में बाक्साइट के कथित अवैध खनन की जांच उस वक्त खूनी वारदात में बदल गई, जब कुसमी एसडीएम करूण डहरिया और उनके साथ मौजूद लोगों पर ग्रामीणों से बेरहमी से मारपीट का आरोप लगा। इस हमले में एक आदिवासी की मौत हो गई, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हैं।
सरकारी जांच… लेकिन सरकारी गाड़ी नदारद?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर एसडीएम अवैध माइनिंग की सरकारी जांच के लिए गए थे, तो वे सरकारी वाहन की बजाय थार गाड़ी में क्यों पहुंचे?
वह थार गाड़ी किसकी थी?
राजस्व विभाग के अधिकृत अमले के बजाय प्राइवेट लोग साथ क्यों थे?
जांच के दौरान रॉड और डंडे किस कानून के तहत इस्तेमाल किए गए?
ये सवाल सिर्फ ग्रामीणों के नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर खड़े हो रहे हैं।
खेत से लौट रहे थे, अपराधी बना दिए गए
घायल ग्रामीणों के मुताबिक, वे रात करीब 8 बजे गेहूं के खेत में सिंचाई कर वापस लौट रहे थे। हंसपुर के सरना स्थल के पास अचानक दो गाड़ियों में सवार 6–7 लोगों ने उन्हें रोका, पूछताछ के नाम पर गाली-गलौज की और फिर रॉड, डंडों और लात-घूंसे बरसाने लगे।
ग्रामीणों का आरोप है कि मारपीट में उन्हें जबरन गाड़ी में बैठाया गया। रास्ते में 60 वर्षीय राम नरेश राम बेहोश हो गए, जिन्हें आनन-फानन में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कुसमी ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
मौत के बाद ‘कागज़ी बचाव’ की तैयारी?
सूत्रों का दावा है कि घटना के बाद एसडीएम ने फोन कर नायब तहसीलदार को मौके पर बुलाया, ताकि यह दर्शाया जा सके कि उनके साथ पूरा राजस्व अमला मौजूद था।
सवाल यह है— अगर शुरू से ही पूरा अमला साथ था, तो प्राइवेट लोग कहां से आए?
डर का माहौल, पुलिस छावनी में बदला कुसमी
घटना के बाद संभावित आक्रोश को देखते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और कुसमी थाना क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। जांच के लिए बलरामपुर के एडिशनल एसपी विश्व दीपक त्रिपाठी कुसमी पहुंच चुके हैं। जानकारी के अनुसार, कुसमी एसडीएम, नायब तहसीलदार और मारपीट में शामिल बताए जा रहे युवकों को राजपुर थाने में बैठाकर रखा गया है।
सवाल जो सरकार को जवाब देना होगा
क्या अब अवैध खनन की जांच का मतलब ग्रामीणों की पिटाई है?
क्या एक एसडीएम को न्यायाधीश, पुलिस और जल्लाद तीनों बनने का अधिकार है?
एक आदिवासी की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या यह मामला भी जांच के नाम पर दफन कर दिया जाएगा?
यह सिर्फ एक गांव की घटना नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है, जहाँ कानून की किताब कमजोर और लाठी मजबूत होती जा रही है।
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