देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी जब ग्वालियर की गलियों में आम इंसान बन जाते थे अटल जी… जानिए उनका दिलचस्प ‘MP कनेक्शन’
डेस्क। देश की राजनीति में जब भी शब्दों के जादूगर और बेबाक फैसलों वाले नेता का जिक्र आता है, तो ज़हन में सबसे पहला नाम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी का ही उभरता है। 16 अगस्त उनकी पुण्यतिथि है। दुनिया उन्हें एक कद्दावर प्रधानमंत्री, एक प्रखर वक्ता और एक ‘अजातशत्रु’ राजनेता के रूप में जानती है, लेकिन मध्य प्रदेश के लिए वे हमेशा ग्वालियर की गलियों के वही ‘अटल’ रहे, जिनका दिल देश के तख्त पर बैठकर भी अपनी मिट्टी के लिए ही धड़कता था।
उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर, आइए पलटते हैं उनके जीवन के उस पन्ने को, जिसमें दिल्ली की कड़क राजनीति नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की मिठास और ग्वालियर का ठेठपन बसा है।
‘कमल सिंह का बाग’ और वो शुरुआती कविताएं
25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के ‘कमल सिंह का बाग’ इलाके में जब एक शिक्षक पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर बेटे का जन्म हुआ, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह बच्चा एक दिन देश का भाग्य विधाता बनेगा। अटल जी की जड़ें मध्य प्रदेश की मिट्टी में बहुत गहराई तक धंसी थीं। उनकी शुरुआती पढ़ाई से लेकर स्नातक तक की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हुई। यह वही जगह थी जहां उनके भीतर के उस प्रखर वक्ता ने जन्म लिया, जिसे सुनने के लिए आगे चलकर संसद में विरोधी भी चुप होकर बैठे रहते थे।

जब प्रधानमंत्री का काफिला ‘बहादुरा के लड्डू’ के लिए रुक जाता
अटल जी का मध्य प्रदेश कनेक्शन सिर्फ राजनीति या जन्मस्थान तक सीमित नहीं था, बल्कि यह स्वाद के धागों से भी बुना हुआ था। शायद ही कोई जानता हो कि कड़े राजनीतिक फैसले लेने वाले अटल जी असल ज़िंदगी में बेहद चटोरे थे!
ग्वालियर के लोग आज भी वो किस्से गर्व से सुनाते हैं, जब देश का यह शीर्ष नेता अपने शहर आता था। प्रोटोकॉल और सुरक्षा का तामझाम एक तरफ रह जाता और अटल जी का काफिला सीधे ‘नया बाजार की मंगोड़ी-कचौड़ी’ या ‘बहादुरा के बूंदी के लड्डू’ की दुकान पर जाकर ही रुकता था। दिल्ली के दरबार में बैठे अटल जी के लिए अक्सर ग्वालियर से खास मिठाइयाँ ट्रेन के जरिए भिजवाई जाती थीं।

सियासत का चोला और ठेठ ‘ग्वालियरिया’ अंदाज
अटल जी जब भी दिल्ली से अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश आते, तो वे नेतागिरी का चोला उतारकर पूरी तरह से एक आम इंसान बन जाते। उनके बचपन के दोस्त बताते हैं कि अपनों के बीच बैठकर वे अक्सर ठेठ ग्वालियरिया लहजे में बात करते और उनके ठहाकों से पूरा कमरा गूंज उठता था। उन्हें ट्रेन का सफर बहुत पसंद था, क्योंकि यह उन्हें आम जनता और अपने लोगों से सीधा जोड़ता था।

एक ऐसी विरासत जो हमेशा ‘अटल’ रहेगी
मध्य प्रदेश ने देश को सिर्फ एक राजनेता नहीं दिया, बल्कि एक ऐसा संवेदनशील कवि और माटी का लाल दिया, जिसने पूरी दुनिया में भारत का डंका बजाया। आज भले ही अटल जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ग्वालियर की उन गलियों में, विक्टोरिया कॉलेज के उन कमरों में और उस ‘बहादुरा के लड्डू’ की मिठास में उनका वह ‘एमपी कनेक्शन’ हमेशा ज़िंदा रहेगा।

