Aravalli Protection at Risk: दुनिया की पुरानी पर्वत श्रृंखला पर नया खतरा? सुप्रीम कोर्ट ने दी नई परिभाषा

Aravalli Protection at Risk: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों के लिए नई आधिकारिक परिभाषा को मंजूरी दे दी है। यह फैसला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक के कानूनी संरक्षण में बदलाव ला सकता है। 20 नवंबर को पीठ ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया, जिसमें अरावली की 692 किलोमीटर लंबी सीमा को मानकीकृत करने की मांग थी।

नए नियम के अनुसार, अरावली क्षेत्र की किसी भी भू-आकृति की न्यूनतम ऊंचाई 100 मीटर होनी चाहिए, जिसमें ढलान और आसपास के क्षेत्र शामिल हैं। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि विस्तृत वैज्ञानिक मैपिंग और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार किया जाए, और यह काम पूरा होने तक कोई नई माइनिंग लीज जारी न की जाए।

हालांकि, 100-मीटर की सीमा ने विशेषज्ञों में चिंता पैदा कर दी है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 12,081 मैप की गई पहाड़ियों में से केवल 1,048 (8.7%) ही इस मानदंड को पूरा करती हैं। इसका मतलब है कि अरावली क्षेत्र का लगभग 90% हिस्सा कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकता है।

पर्यावरणीय खतरे:

  1. निचली चोटियों और जुड़ी हुई पहाड़ी प्रणालियों का संरक्षण खतरे में।
  2. वाइल्डलाइफ कॉरिडोर प्रभावित, तेंदुए, लकड़बग्घे और पक्षियों पर असर।
  3. ग्राउंडवॉटर रिचार्ज क्षेत्रों को नुकसान।
  4. झाड़ीदार जंगल और देसी पेड़ प्रभावित, रेप्टाइल्स और पक्षियों की प्रजातियों पर असर।
  5. नेशनल कैपिटल रीजन में धूल, गर्मी और रेगिस्तान बनने का खतरा बढ़ना।
  6. माइक्रोक्लाइमेट पर असर, ग्राउंडवॉटर स्तर में गिरावट।

सियासी प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसे “अरावली के लिए डेथ वारंट” कहा। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी इसके गंभीर पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावों की चेतावनी दी।

न्यूज़ एजेंसी PTI के अनुसार, अरावली की सही मैपिंग और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोर्ट का 100-मीटर नियम सस्टेनेबल माइनिंग और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की चुनौती बढ़ा देता है।

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