Aravalli Hills Controversy Explained: अरावली पहाड़ियां क्यों चर्चा में? सुप्रीम कोर्ट के आदेश से शुरू हुआ ‘सेव अरावली’ अभियान, जानिए पूरा मामला
Aravalli Hills Controversy Explained: भारत की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक अरावली इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट में खनन से जुड़ी एक याचिका पर केंद्र सरकार के जवाब और उसके बाद आए न्यायालय के निर्देशों ने अरावली के संरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर ‘सेव अरावली कैंपेन’ चल रहा है और राजनीतिक दल भी आमने-सामने आ गए हैं।
क्या है अरावली पर्वत शृंखला और क्यों है यह इतनी अहम?
अरावली पर्वत शृंखला करीब दो अरब वर्ष पुरानी मानी जाती है और यह दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में शामिल है। यह गुजरात से दिल्ली तक लगभग 650 किलोमीटर में फैली हुई है और थार रेगिस्तान को उत्तर भारत की ओर बढ़ने से रोकने में प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार अरावली न केवल जलवायु संतुलन बनाए रखने में मदद करती है, बल्कि भूजल रिचार्ज, जैव विविधता संरक्षण और वायु गुणवत्ता सुधार में भी इसकी अहम भूमिका है। चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों का उद्गम भी इसी क्षेत्र से होता है।
खनन और अरावली: पुराना विवाद
अरावली क्षेत्र में बालू पत्थर, चूना पत्थर, संगमरमर और कई कीमती खनिज पाए जाते हैं। इन्हीं संसाधनों के कारण दशकों से यहां खनन होता रहा है। लेकिन बीते वर्षों में बढ़े खनन ने भूजल स्तर गिरने, प्रदूषण बढ़ने और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसी वजह से अलग-अलग समय पर कई इलाकों में खनन पर प्रतिबंध लगाए गए।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और नया विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अलग-अलग राज्य और एजेंसियां अरावली की पहचान के लिए अलग मानक अपना रही हैं। इस भ्रम को दूर करने के लिए बनाई गई समिति ने 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके आधार पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत शृंखला का हिस्सा माना जाए।
पर्यावरणविदों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे बड़ी संख्या में छोटी पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएंगी और उन पर खनन का रास्ता खुल सकता है।
कितना हिस्सा होगा प्रभावित?
विशेषज्ञों के मुताबिक राजस्थान में मौजूद अरावली की लगभग 90% पहाड़ियां 100 मीटर की ऊंचाई के मानक पर खरी नहीं उतरतीं। इसका अर्थ है कि केवल 8–10% क्षेत्र को ही कानूनी रूप से अरावली माना जाएगा, जबकि शेष क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता है।
विशेषज्ञों की राय
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के पूर्व महानिदेशक दिनेश गुप्ता का कहना है कि 2008 में बनी समिति ने 100 मीटर से नीचे के क्षेत्रों को नॉन-अरावली मानने की सिफारिश की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार भी किया था। उनके अनुसार, रेगिस्तान फैलने के पीछे केवल अरावली का क्षरण ही एकमात्र कारण नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में गर्माया मुद्दा
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ‘सेव अरावली’ अभियान का समर्थन करते हुए कहा कि अरावली जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है। उनका कहना है कि छोटी पहाड़ियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी बड़ी चोटियां।
वहीं भाजपा ने कांग्रेस पर इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया है। हालांकि, भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी सरकार से सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दायर करने की मांग की है, ताकि अरावली की परिभाषा को केवल ऊंचाई तक सीमित न रखा जाए।
क्यों अहम है यह बहस?
पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली को हुआ नुकसान स्थायी हो सकता है। एक बार पहाड़ और जलधाराएं नष्ट हो गईं, तो उन्हें दोबारा स्थापित करने में सदियां लग सकती हैं। यही कारण है कि अरावली का संरक्षण केवल कानूनी या राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी बन गया है।
