नेपाल में हिंसा और सत्ता परिवर्तन : इसके पीछे अमेरिका का हाथ? CIA के पुराने कारनामों से उठे सवाल

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नेपाल एक बार फिर गहरे राजनीतिक संकट में फंस गया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को मात्र दो दिनों के भीतर अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। इस अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन ने देश और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चौंका दिया है। अब सवाल यह उठ रहा है, क्या इस घटनाक्रम के पीछे अमेरिका की कोई गुप्त भूमिका है?

अमेरिका की ‘मौन संलिप्तता’ पर उठते सवाल

केपी ओली की सरकार के पतन के बाद राजनीतिक गलियारों और सुरक्षा एजेंसियों में एक ही चर्चा है, क्या यह सब कुछ स्वाभाविक था या कहीं पर्दे के पीछे से कोई विदेशी ताकत इसे नियंत्रित कर रही थी? कई वरिष्ठ पत्रकारों, सेना के अधिकारियों और पुलिस सूत्रों का मानना है कि इतनी बड़ी हलचल बिना किसी बाहरी समर्थन के संभव नहीं हो सकती।

अमेरिका का नाम सबसे आगे इसलिए आ रहा है क्योंकि उसने अतीत में भी नेपाल की राजनीति और सुरक्षा ढांचे में हस्तक्षेप किया है, कभी चीन के खिलाफ रणनीतिक रूप से, तो कभी माओवादी विद्रोहियों से निपटने के नाम पर।

इतिहास में भी दर्ज हैं अमेरिकी हस्तक्षेप

शीत युद्ध के समय अमेरिका ने नेपाल को चीन के खिलाफ खुफिया जानकारी जुटाने और दुष्प्रचार अभियानों के लिए एक रणनीतिक ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किया था। 1971 में निक्सन प्रशासन के दस्तावेजों में इसका उल्लेख मिलता है। उस समय नेपाल में अमेरिकी दूतावास के माध्यम से CIA ने चीन विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया।

मस्टैंग गुरिल्ला बल और CIA का गहरा कनेक्शन

1960 के दशक में अमेरिका ने नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों को ट्रेनिंग और हथियार देकर “मस्टैंग गुरिल्ला बल” का गठन किया था। इन गुरिल्लाओं ने बाद में फिल्म ‘शैडो सर्कस: द सीआईए इन तिब्बत’ में खुद स्वीकार किया कि उन्हें अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने प्रशिक्षित किया और चीन के खिलाफ इस्तेमाल किया गया। लेकिन जैसे ही अमेरिका-चीन संबंध सुधरे, इन गुरिल्ला बलों को छोड़ दिया गया, जिससे नेपाल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुश्किलें झेलनी पड़ीं।

9/11 के बाद नेपाल में बढ़ी अमेरिकी सैन्य गतिविधि

2001 में अमेरिका में हुए 9/11 हमलों के बाद ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ की आड़ में अमेरिका ने नेपाल में अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत किया। माओवादी विद्रोहियों को आतंकी घोषित किया गया और काठमांडू को भारी सैन्य सहायता दी गई। अमेरिकी रक्षा सहयोग कार्यालय की स्थापना, हजारों M-16 राइफलों की आपूर्ति, और रॉयल नेपाल आर्मी का दोगुना विस्तार — यह सब अमेरिका की सैन्य रणनीति का हिस्सा था।

ओली सरकार के पतन में अमेरिकी रणनीति?

अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका ने एक बार फिर नेपाल में सत्ता परिवर्तन के लिए पर्दे के पीछे से दबाव बनाया? कई विश्लेषकों का कहना है कि ओली सरकार का पतन जितना अचानक हुआ, उतना ही रहस्यमयी भी है। इस पूरे घटनाक्रम में किसी बड़े नेपाली राजनीतिक चेहरे की अनुपस्थिति संदेह को और बढ़ा देती है।

एक वरिष्ठ नेपाली अधिकारी ने दावा किया है कि यदि नई सरकार सहयोग दे तो वे ठोस सबूत जुटा सकते हैं, जिससे यह सिद्ध हो सके कि इस बदलाव में विदेशी ताकतों का हाथ था।

क्या वॉशिंगटन ने फिर से काठमांडू में ‘चाबी घुमाई’?

हालांकि अमेरिका की सीधी भूमिका का अब तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन अतीत के अनुभव और वर्तमान की परिस्थितियाँ इस बात की ओर इशारा जरूर करती हैं कि काठमांडू की सत्ता में बदलाव किसी विदेशी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका हमेशा से पर्दे के पीछे रहकर काम करता आया है और यह घटनाक्रम भी उसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

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