कानून बनाम नैतिकता: जोसेफ शाइन फैसले की छाया में राहुल टिकरिहा विवाद, फैसला अब बीजेपी के हाथ

रायपुर — भारतीय समाज में विवाह को हमेशा से एक पवित्र बंधन के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन जब निजी रिश्ते सार्वजनिक बहस और कानूनी विमर्श का हिस्सा बनते हैं, तो सवाल उठता है—क्या हर नैतिक विचलन को कानूनन अपराध मानना चाहिए?

यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है, जब छत्तीसगढ़ भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष राहुल टिकरिहा पर उनके ही परिवार के सदस्य द्वारा विवाहेतर संबंध के आरोप लगाए गए हैं। यह मामला अब केवल पारिवारिक विवाद नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और नैतिक बहस का विषय बन चुका है।

जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ: ऐतिहासिक फैसला जिसने परिभाषाएं बदलीं

इस प्रकरण की कानूनी पृष्ठभूमि को समझने के लिए 2018 का सुप्रीम कोर्ट का जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है। उस समय भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत व्यभिचार (adultery) को अपराध माना जाता था, लेकिन इसमें केवल पुरुष को दोषी ठहराया जाता था, और महिला को “पीड़िता” माना जाता था — जैसे वह अपने पति की संपत्ति हो।

केरल निवासी जोसेफ शाइन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि: धारा 497 महिलाओं की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता के खिलाफ है, यह अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, और यह विवाह को कानून की गिरफ्त में लाकर निजता के अधिकार का हनन करती है।

नतीजा:

व्यभिचार अब अपराध नहीं रहा। यह एक निजी, नैतिक और वैवाहिक मामला है, जो तलाक का आधार हो सकता है, परंतु जेल का कारण नहीं।

राहुल टिकरिहा पर आरोप: कानूनी दृष्टि से नहीं, नैतिक कसौटी पर सवाल

छत्तीसगढ़ में भाजपा युवा मोर्चा के प्रमुख राहुल टिकरिहा पर उनके चाचा द्वारा यह आरोप लगाया गया कि उनका उनकी चाची के साथ अवैध संबंध रहा है। यह आरोप सोशल मीडिया और मीडिया के जरिये अब व्यापक राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है।

कानूनी पहलू:

जोसेफ शाइन फैसले के बाद इस तरह के विवाहेतर संबंध को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। अगर आरोप सही भी हो, तब भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, और न ही पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है। इस आधार पर राहुल टिकरिहा कानून की नजर में निर्दोष हैं।

नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण:

राजनीति केवल कानून से संचालित नहीं होती। उसमें सार्वजनिक नैतिकता, छवि और विश्वास की भी अहम भूमिका होती है। विशेषकर भाजपा जैसी पार्टी, जो भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्य और नैतिकता की बात करती रही है, उसके नेता पर ऐसा आरोप लगना साख और दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाता है।

भाजपा की असली परीक्षा: क्या नैतिकता पर भी खरा उतरेगा नेतृत्व?

भाजपा का राजनीतिक विमर्श हमेशा “संस्कृति और सभ्यता की रक्षा” पर केंद्रित रहा है। ऐसे में राहुल टिकरिहा जैसे नेता पर गंभीर नैतिक आरोप लगना पार्टी के लिए राजनीतिक दुविधा बन गया है।

अब सवाल यह है:

क्या पार्टी कानूनी तकनीकी आधार पर टिकरिहा का बचाव करेगी?

या वह नैतिक आदर्शों के अनुरूप कदम उठाकर जनता को यह संदेश देगी कि नैतिक जवाबदेही भी उतनी ही अहम है?

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