SPECIAL STORY : जब बोलना मना था, लिखना गुनाह और सोचना भी खतरा! जानिए क्यों थरथराया था लोकतंत्र

25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की और राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मंजूरी के साथ देश पर 21 महीने तक तानाशाही का शासन लाद दिया गया। आज इस आपातकाल को 49 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसके प्रभाव और सवाल आज भी राजनीति और समाज में गूंज रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस दिन को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय बताते हुए कांग्रेस को लोकतंत्र का हत्यारा करार दिया।

आपातकाल लगाने की वजह क्या थी?

आपातकाल की पृष्ठभूमि उस समय तैयार हुई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी ठहराया। यह मुकदमा उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने दायर किया था। कोर्ट ने इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता को रद्द कर दिया, जिससे उनके प्रधानमंत्री पद पर बने रहना सवालों के घेरे में आ गया। इसी के बाद सरकार ने विरोध और अस्थिरता की आशंका के बीच देश में आपातकाल लगाने का फैसला लिया।

आरके धवन, जो इंदिरा गांधी के निजी सचिव थे, उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि जनवरी 1975 में ही पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एसएस राय ने इंदिरा को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। धवन के अनुसार, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी और उन्होंने तत्काल हस्ताक्षर कर दिए थे।

क्या-क्या हुआ आपातकाल के दौरान?

आपातकाल के ऐलान के साथ ही देश की तस्वीर पूरी तरह बदल गई थी।

  • मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए।
    नागरिकों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार तक छीन लिए गए।
  • विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां।
    अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इतना ही नहीं, हजारों कार्यकर्ताओं को भी जेल में बंद कर दिया गया था।
  • प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गई।
    हर अखबार में सेंसर अधिकारी तैनात कर दिए गए थे और उनकी मंजूरी के बिना एक भी खबर प्रकाशित नहीं हो सकती थी। सरकार के खिलाफ कुछ लिखने पर पत्रकारों की गिरफ्तारियां हुईं।
  • नसबंदी और बुलडोजर की मार।
    संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया। दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में अतिक्रमण हटाने के नाम पर बर्बरता की गई। हजारों लोग बेघर हुए और कई मारे भी गए।

आरके धवन ने खोले राज

इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे आरके धवन ने बताया कि इंदिरा गांधी को नसबंदी और तुर्कमान गेट जैसे मामलों की जानकारी नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि इंदिरा गांधी इस्तीफा देने को तैयार थीं, लेकिन उनके मंत्रियों ने उन्हें रोका। धवन के मुताबिक इंदिरा गांधी को एक रिपोर्ट सौंपी गई थी जिसमें कहा गया कि अगर चुनाव कराए गए तो वे 340 सीटें जीत सकती हैं। इसी आत्मविश्वास के चलते उन्होंने 1977 में चुनाव करवाए, लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।

इंदिरा गांधी इस हार से टूटीं नहीं, बल्कि उन्होंने कहा, “शुक्र है, अब मेरे पास खुद के लिए समय होगा।” यह बयान बताता है कि व्यक्तिगत रूप से वह सत्ता की मोहजाल से निकल चुकी थीं, लेकिन देश को जो नुकसान हो चुका था, उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो सकी।

भाजपा ने क्यों उठाया मुद्दा?

भाजपा ने आपातकाल को याद करते हुए कांग्रेस पर तीखे वार किए। जब विपक्ष वर्तमान सरकार पर संविधान विरोधी होने का आरोप लगाता है, तो भाजपा इतिहास की ओर इशारा करते हुए कहती है कि असली संविधान की हत्या तो 1975 में हुई थी। जेपी नड्डा ने कहा कि कांग्रेस ने लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

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