दिवाली से पहले रसोई का हिसाब बिगाड़ सकती है महंगाई, चावल-दाल से तेल तक बढ़े दाम

Diwali Inflation

त्योहारों में घर की रौनक बढ़ाने के साथ-साथ खर्च भी बढ़ जाता है। दिवाली पर मिठाइयां बनानी हों, मेहमानों की खातिरदारी करनी हो या रोजमर्रा का राशन खरीदना हो, हर चीज के लिए जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ती है। इस बार वैश्विक बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई तेजी ने चिंता बढ़ा दी है। चावल, चीनी, दाल और खाद्य तेल जैसी जरूरी चीजों के महंगे होने से आने वाले दिनों में घरेलू बजट पर दबाव बढ़ सकता है।

कृषि उत्पादों की कीमतों में तेजी के पीछे कई वजहें सामने आ रही हैं। कुछ देशों में प्रतिकूल मौसम से फसलों के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। वहीं, मध्य-पूर्व में तनाव और समुद्री रास्तों पर माल ढुलाई को लेकर अनिश्चितता ने सप्लाई चेन की चिंता बढ़ाई है। परिवहन महंगा होने से भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।

चावल के बाजार में तेजी, उत्पादन को लेकर चिंता

दुनियाभर में चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसकी एक वजह आपूर्ति पर दबाव और परिवहन की बढ़ती लागत बताई जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के वायदा भाव में 30 से 70 फीसदी तक की तेजी आई है।

खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुमान के मुताबिक, वैश्विक चावल उत्पादन में पिछले साल की तुलना में 2.4 फीसदी की गिरावट आ सकती है। भारत में भी उत्पादन 15.4 करोड़ टन से घटकर 14.4 करोड़ टन रहने का अनुमान दिया गया है। यदि उत्पादन और आपूर्ति में कमी आती है, तो चावल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर कितना पड़ेगा, यह घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, स्टॉक और बाजार में उपलब्धता पर भी निर्भर करेगा।

चीनी महंगी होने से मिठाइयों का खर्च बढ़ने की आशंका

दिवाली के दौरान मिठाइयों और पकवानों की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में चीनी की कीमतों में तेजी घरों के साथ-साथ मिठाई कारोबार की लागत को भी प्रभावित कर सकती है।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में कच्ची चीनी के वायदा भाव करीब 8 फीसदी बढ़े हैं। जुलाई के निचले स्तर से कीमतों में लगभग 40 फीसदी की बढ़ोतरी बताई गई है। ब्राजील, भारत, थाईलैंड और यूरोपीय संघ में खराब मौसम के कारण उत्पादन घटने की आशंका भी जताई गई है।

यूरोपीय संघ में उत्पादन 19 फीसदी और थाईलैंड में 17 फीसदी तक घटने का अनुमान दिया गया है। यदि वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होती है, तो चीनी बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

खाद्य तेल के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा

खाद्य तेलों की कीमतों पर केवल फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि ऊर्जा बाजार का भी असर पड़ता है। वनस्पति तेल का इस्तेमाल खाना पकाने के अलावा बायोफ्यूल बनाने में भी होता है। ऐसे में ईंधन क्षेत्र से मांग बढ़ने पर खाद्य उपयोग के लिए उपलब्ध तेल पर दबाव पड़ सकता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल होने वाले वनस्पति तेल का करीब 27 फीसदी हिस्सा बायोफ्यूल उत्पादन में खर्च होता है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुमान में इस उपयोग के बढ़ने की संभावना जताई गई है। हालांकि, इसका वास्तविक असर अलग-अलग तेलों की आपूर्ति, उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार बदल सकता है।

चना, उड़द और मटर की तेजी भी बढ़ा सकती है खर्च

रसोई के बजट में दालों की अहम भूमिका होती है। पिछले एक साल के दौरान चना, उड़द और मटर की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के आंकड़े सामने आए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चना 23 फीसदी, उड़द 24 फीसदी और मटर 47 फीसदी तक महंगे हुए हैं।

इनकी कीमतों पर आयात शुल्क, घरेलू उत्पादन और बाजार में उपलब्ध स्टॉक का असर पड़ सकता है। इसके अलावा, जौ के दाम में 44 फीसदी, मक्का में 9 फीसदी और चाय की कीमतों में 10 फीसदी तक बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया गया है।

कृषि उत्पादों की कीमतों में तेजी का असर केवल राशन तक सीमित नहीं रहता। इनका इस्तेमाल खाद्य प्रसंस्करण और अन्य उत्पादों में होने के कारण उत्पादन लागत पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

क्या आगे और बढ़ेगी महंगाई?

खाद्य वस्तुओं की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। मौसम की अनिश्चितता, उत्पादन में संभावित कमी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों में बाधाएं कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।

दूसरी ओर, बेहतर फसल, पर्याप्त स्टॉक और आपूर्ति में सुधार से कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी खाद्य वस्तुएं आगे भी लगातार महंगी होंगी।

फिलहाल, त्योहारों के मौसम में उपभोक्ताओं के लिए राशन खरीदते समय कीमतों की तुलना करना और जरूरत के अनुसार बजट बनाना उपयोगी रहेगा। चावल, चीनी, दाल और खाद्य तेल जैसे रोजमर्रा के सामान के दामों में होने वाला बदलाव ही तय करेगा कि आने वाले दिनों में रसोई का खर्च कितना बढ़ता है।

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