‘पीएम और जजों को भी ऐसी छूट नहीं’: सुप्रीम कोर्ट में CEC को हटाने पर तीखी बहस, कोर्ट बोला- ‘पहले आने दें जवाब’

नई दिल्ली। देश की शीर्ष अदालत से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को बड़ी राहत मिली है। निर्वाचन आयोग में कथित एकतरफा फैसलों और नियमों के उल्लंघन को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को उनके पद से निलंबित करने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत को पूरी उम्मीद है कि यह संवैधानिक संस्था तय कानून के दायरे में रहकर ही काम करेगी। हालांकि, पीठ ने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

एकतरफा फैसलों और नए नियमों को लेकर दायर हुई थीं याचिकाएं

यह कानूनी विवाद सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर याचिकाओं के बाद शीर्ष अदालत तक पहुंचा। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि एसआईआर (SIR), फॉर्म-6 में किए गए अहम संशोधन और चुनाव आयोग द्वारा लिए गए कई अन्य बड़े प्रशासनिक फैसले कानून द्वारा निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी करके लिए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग से जुड़े नियमों के तहत सभी फैसले सर्वसम्मति से या फिर कम से कम बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में इन प्रक्रियाओं की अनदेखी की जा रही है।

‘पीएम और जजों को भी ऐसी इम्युनिटी नहीं’: कोर्ट में जोरदार बहस

याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने जनप्रतिनिधित्व कानून के मूल स्वरूप, हालिया संशोधनों और धारा 10(2) व 10(3) की दलीलें रखीं। उन्होंने अदालत में दावा किया कि नए कानूनी प्रावधानों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को असीमित शक्तियां दे दी हैं और उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद भी जांच से सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया गया है। विकास सिंह ने तीखी दलील देते हुए कहा कि ऐसी कानूनी छूट देश के प्रधानमंत्री और न्यायपालिका के जजों तक को हासिल नहीं है।

इस दलील पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पद पर बने रहने के दौरान कानूनी संरक्षण पहले भी व्यवस्था में मौजूद था। वहीं चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि संबंधित कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं पहले से ही अदालत के समक्ष विचाराधीन हैं। इसके जवाब में वरिष्ठ वकील ने साफ किया कि वे इस याचिका में कानून को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि उनका मुख्य मकसद यह देखना है कि चुनाव आयोग के भीतर कामकाज किस तरह से चलाया जा रहा है।

दोनों आयुक्तों को आयोग सौंपने और बरनवाल जजमेंट की मांग

वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने अदालत से आग्रह किया कि जब तक मामले की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक ज्ञानेश कुमार को सीईसी के दायित्वों से निलंबित कर दिया जाए और बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को आयोग का संचालन करने दिया जाए। उन्होंने अनूप बरनवाल मामले के उस ऐतिहासिक फैसले की व्यवस्था बहाल करने की भी मांग दोहराई, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया गया था।

याचिकाकर्ता पक्ष ने गंभीर आरोप लगाया कि प्रक्रिया तय करने वाले नीतिगत निर्णय जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होने चाहिए, जबकि वास्तविक कामकाज से जुड़े निर्णय बहुमत से लिए जाने का नियम है, लेकिन वर्तमान में एकतरफा फैसले थोपे जा रहे हैं।

‘अखबार की रिपोर्ट पर सीधे आदेश नहीं’: सीजेआई की दो टूक

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को याद दिलाया कि उनकी दलीलें काफी हद तक एक मीडिया रिपोर्ट पर आधारित हैं और अदालत महज किसी रिपोर्ट के आधार पर संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ ऐसा अंतरिम आदेश पारित नहीं कर सकती। सीजेआई ने कहा कि अदालत को पहले चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष देखना होगा।

जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने संबंधित समाचार का खंडन नहीं किया है और चुनाव संपन्न हो जाने के बाद नतीजों को पलटना मुमकिन नहीं होगा, तब चीफ जस्टिस ने कड़े शब्दों में कहा कि कानून अनिवार्य है और अदालत उम्मीद करती है कि चुनाव आयोग ने तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया होगा। पीठ ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि जांच में किसी भी वैधानिक नियम का उल्लंघन पाया जाता है, तो अदालत के पास उन फैसलों को पलटने का पूरा अधिकार सुरक्षित है।

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