Lal Bahadur Shastri Jayanti: क्यों शास्त्री जी ने देश से कहा था- एक वक्त का खाना छोड़ दीजिए? वजह जानकर चौंक जाएंगे
Lal Bahadur Shastri Jayanti: देश युद्ध के दौर से गुजर रहा था, अनाज की कमी बढ़ रही थी और हालात आसान नहीं थे। तभी प्रधानमंत्री Lal Bahadur Shastri ने देशवासियों से एक छोटी-सी अपील की, जिसे लाखों लोगों ने अपना लिया।
सोचिए, एक ऐसा समय जब देश नया-नया आजाद हुआ था। संसाधन सीमित थे, अनाज की कमी थी और ऊपर से देश युद्ध के हालात से गुजर रहा था। ऐसे वक्त में देश के प्रधानमंत्री ने लोगों से कोई बड़ा वादा नहीं किया, बल्कि खुद से जुड़ी एक छोटी-सी जिम्मेदारी निभाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि देश को मुश्किल से निकालने के लिए लोग एक वक्त का खाना छोड़ सकते हैं।
यह अपील थी देश के दूसरे प्रधानमंत्री Lal Bahadur Shastri की। खास बात यह थी कि देशवासियों ने उनकी बात को सिर्फ सुना नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में उसे अपनाया भी।
आज 2 अक्टूबर को जब देश महात्मा गांधी की जयंती मनाता है, उसी दिन Lal Bahadur Shastri की जयंती भी होती है। आइए जानते हैं उस प्रधानमंत्री की कहानी, जिसने बेहद सादगी से देश की बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं।
मुगलसराय से शुरू हुई कहानी
2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में Lal Bahadur Shastri का जन्म हुआ। साधारण परिवार में जन्मे शास्त्री जी का बचपन बहुत आसान नहीं था। लेकिन मुश्किलों के बीच पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर काशी विद्यापीठ से शिक्षा हासिल की।
यहीं से उनकी जिंदगी ने एक नया रास्ता पकड़ा। देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और Lal Bahadur Shastri जी भी इस आंदोलन से जुड़ गए।
अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई और जेल का सफर
आजादी की लड़ाई में शामिल होना उनके लिए आसान फैसला नहीं था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लेने के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
नमक सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, शास्त्री जी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। इस दौरान उन्हें करीब नौ बार जेल जाना पड़ा।
लेकिन जेल भी उनके इरादे नहीं बदल सकी।
आजादी के बाद उन्होंने राजनीति में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं और धीरे-धीरे देश के बड़े नेताओं में उनकी पहचान बनने लगी।
नेहरू के निधन के बाद मिली देश की कमान
27 मई 1964 को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ। देश के सामने बड़ा सवाल था कि अब प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी कौन संभालेगा?
आखिरकार लाल बहादुर शास्त्री को यह जिम्मेदारी मिली।
9 जून 1964 को उन्होंने भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालते ही उनके सामने चुनौतियों की लंबी सूची थी। देश में खाद्यान्न की कमी थी और अनाज के लिए विदेशों पर निर्भरता बनी हुई थी।
अभी शास्त्री जी इस समस्या से निपटने की कोशिश कर ही रहे थे कि देश के सामने एक और बड़ा संकट खड़ा हो गया।

एक तरफ अनाज की कमी, दूसरी तरफ युद्ध
1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया।
एक तरफ सीमा पर जवान देश की रक्षा कर रहे थे और दूसरी तरफ देश के घरों में अनाज की चिंता थी।
ऐसे समय में शास्त्री जी ने देशवासियों का हौसला बढ़ाया और एक ऐसा नारा दिया जो आज भी भारत के इतिहास में याद किया जाता है-
‘जय जवान, जय किसान।’
इस छोटे से नारे में उन्होंने देश की दो बड़ी ताकतों को सामने रखा। सीमा पर खड़ा जवान और खेत में मेहनत करने वाला किसान।
फिर Lal Bahadur Shastri जी ने देश से मांगा एक छोटा-सा त्याग
अनाज की कमी इतनी बड़ी चुनौती थी कि सरकार को लोगों की मदद की जरूरत थी।
तब शास्त्री जी ने देशवासियों से अपील की कि वे एक वक्त का खाना छोड़ने की कोशिश करें।
यह कोई आदेश नहीं था। यह एक अपील थी।
लेकिन इस अपील का असर इतना गहरा हुआ कि देश के कई लोगों ने इसे स्वीकार किया। लोगों ने अपने स्तर पर भोजन की बचत शुरू की और देश के साथ खड़े होने का संदेश दिया।
Lal Bahadur Shastri जी की खासियत यही थी, वह लोगों से वही बात कहते थे, जिसे खुद भी गंभीरता से मानते थे।
1965 के युद्ध ने बना दिया राष्ट्रीय नेता
युद्ध के दौरान शास्त्री जी का नेतृत्व देश के सामने साफ दिखाई दिया। उनका शांत स्वभाव और मुश्किल समय में मजबूत फैसले लेने की क्षमता लोगों को प्रभावित कर रही थी।
1965 का युद्ध खत्म हुआ और भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की कोशिशें शुरू हुईं।
इसके लिए दोनों देशों के बीच सोवियत संघ के ताशकंद में बातचीत हुई।
ताशकंद में समझौता और फिर एक ऐसी खबर जिसने देश को हिला दिया
10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते पर भारत की ओर से लाल बहादुर शास्त्री ने हस्ताक्षर किए।
लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में से एक होगा।
समझौते के कुछ ही घंटे बाद 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया।
उनकी अचानक मौत की खबर भारत पहुंची तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। एक ऐसा नेता, जिसने युद्ध के समय देश का हौसला बढ़ाया था और संकट के समय आम लोगों से छोटा-सा त्याग मांगा था, अचानक दुनिया से चला गया।
क्यों आज भी याद किए जाते हैं शास्त्री जी?
लाल बहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा। लेकिन उनका नाम आज भी देश के उन नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने मुश्किल समय में लोगों के साथ खड़े होकर नेतृत्व किया।
उनकी कहानी सिर्फ प्रधानमंत्री बनने की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो साधारण जीवन से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचा और मुश्किल वक्त में देश से कहा-
देश के लिए थोड़ा-सा त्याग हम सब कर सकते हैं।
और शायद यही वजह है कि 2 अक्टूबर को गांधी जी के साथ शास्त्री जी को भी पूरा देश सम्मान के साथ याद करता है।
