मोदी की चाय पार्टी में राहुल-अखिलेश को कोई इंटरेस्ट नहीं: किया बहिस्कार, मोदी-शाह के साथ पहुंचीं कनिमोझी

राहुल

नई दिल्ली: संसद का मॉनसून सत्र हंगामे के बीच समाप्त हो गया, लेकिन सदन के बाहर हुई एक मुलाकात ने नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से सत्र के समापन पर आयोजित पारंपरिक चाय पार्टी में विपक्ष के ज्यादातर नेताओं ने हिस्सा नहीं लिया। इस बीच DMK सांसद एमके कनिमोझी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ कार्यक्रम में शामिल होना चर्चा का केंद्र बन गया।

कनिमोझी की इस मौजूदगी को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है, जब संसद में सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर लगातार टकराव देखने को मिला है। हालांकि, उनकी मौजूदगी को किसी नए गठबंधन का संकेत मानने से पहले DMK की आधिकारिक स्थिति का इंतजार जरूरी है।

कुछ मिनट चली लोकसभा की कार्यवाही

मॉनसून सत्र के अंतिम दिन लोकसभा में विपक्षी सांसदों की नारेबाजी के बीच कार्यवाही ज्यादा देर नहीं चल सकी। हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ‘वंदे मातरम’ का गान कराया और सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया। इसके साथ ही मॉनसून सत्र औपचारिक रूप से समाप्त हो गया।

स्पीकर की चाय पार्टी में विपक्ष की गैरमौजूदगी

सत्र के समापन के बाद ओम बिरला ने अपने चैंबर में फ्लोर लीडर्स के लिए पारंपरिक चाय पार्टी रखी। सत्ता पक्ष की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत प्रमुख नेता इसमें शामिल हुए। विपक्ष की ओर से हालांकि कार्यक्रम में ज्यादातर बड़े नेता नजर नहीं आए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं ने कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी। ऐसे में DMK की ओर से कनिमोझी का अकेले पहुंचना राजनीतिक रूप से खास चर्चा का विषय बन गया।

पिछले साल DMK ने भी किया था बहिष्कार

कनिमोझी की इस बार की मौजूदगी को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले वर्ष मॉनसून सत्र की समाप्ति पर आयोजित स्पीकर की चाय पार्टी में DMK भी विपक्ष के बहिष्कार का हिस्सा थी। तब DMK की ओर से कोई नेता कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ था। इस बार स्थिति अलग नजर आई और कनिमोझी कार्यक्रम में पहुंचीं। इसी वजह से राजनीतिक विश्लेषण में DMK के रुख को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

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कांग्रेस से DMK के रिश्तों में भी खटास?

DMK और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर तमिलनाडु की राजनीति में पहले से ही चर्चाएं होती रही हैं। राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों और कांग्रेस की कुछ संभावित चुनावी रणनीतियों को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की DMK की मांग की चर्चा भी हुई थी। अब कनिमोझी के चाय पार्टी में शामिल होने से यह सवाल उठ रहा है कि क्या DMK विपक्षी एकजुटता को लेकर पहले जैसी भूमिका में नहीं है। हालांकि, इसे लेकर DMK की ओर से किसी नए राजनीतिक गठजोड़ की घोषणा नहीं की गई है।

परिसीमन विधेयक पर DMK का रुख अहम

DMK के पास लोकसभा में 22 सांसद हैं। ऐसे में किसी बड़े संवैधानिक या राजनीतिक मुद्दे पर पार्टी का रुख संसद के समीकरणों में महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर परिसीमन के मुद्दे पर DMK का रुख बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। दक्षिण भारतीय राज्यों की ओर से परिसीमन को लेकर पहले ही चिंता और विरोध की आवाजें उठती रही हैं। इसी वजह से केंद्र सरकार के लिए DMK के साथ संवाद बनाए रखना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।

क्या DMK को साधने की कोशिश कर रही सरकार?

मॉनसून सत्र से पहले भी सरकार और DMK नेतृत्व के बीच संपर्क को लेकर चर्चाएं सामने आई थीं। परिसीमन जैसे मुद्दों पर समर्थन हासिल करने की कोशिशों की बात भी कही गई थी। हालांकि, विपक्षी हंगामे के चलते इस सत्र में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की स्थिति नहीं बन सकी। अब कनिमोझी के स्पीकर की चाय पार्टी में शामिल होने के बाद इन चर्चाओं को फिर हवा मिल गई है।

सिर्फ चाय पार्टी से नहीं तय होगा गठबंधन

राजनीतिक जानकारों के लिए कनिमोझी की मौजूदगी निश्चित रूप से दिलचस्प है, लेकिन केवल किसी औपचारिक कार्यक्रम में शामिल होने से गठबंधन या राजनीतिक पाला बदलने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। फिलहाल DMK विपक्ष का हिस्सा है और पार्टी की भविष्य की रणनीति उसके आधिकारिक बयानों और संसद में उसके रुख से ही स्पष्ट होगी।

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