किसान आंदोलन से लेकर पहलवानों तक सरकार नहीं झुकी, फिर NEET विवाद में क्या बदल गया कि सीधे केंद्रीय मंत्री को देना पड़ा इस्तीफा?

मोदी सरकार

नई दिल्ली। पिछले 11 वर्षों में मोदी सरकार के सामने कई बड़े जनआंदोलन आए। कभी लाखों किसान एक साल तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे, कभी देश के नामी पहलवान जंतर-मंतर पर न्याय की मांग करते रहे, तो कभी अग्निपथ योजना के विरोध में युवाओं ने सड़कों पर आगजनी तक की। इन आंदोलनों के दौरान सरकार ने अपना रुख शायद ही बदला और किसी केंद्रीय मंत्री की कुर्सी नहीं गई। लेकिन NEET-UG विवाद के बाद घटनाक्रम ने अलग मोड़ ले लिया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस बार ऐसा क्या बदल गया, जिसने सरकार को अलग रणनीति अपनाने पर मजबूर कर दिया? केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ गया जिसे मोदी सरकार ने भी स्वीकार भी कर लिया । क्या यह केवल छात्रों का गुस्सा था, बढ़ता जनदबाव, या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक गणित भी काम कर रहा है? इसी सवाल की पड़ताल इस विश्लेषण में।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा सरकार पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह दबाव की राजनीति के सामने आसानी से नहीं झुकती।

पिछले 11 वर्षों के बड़े आंदोलन

  1. भूमि अधिग्रहण कानून विवाद (2015)

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन को लेकर विपक्ष और किसान संगठनों ने व्यापक विरोध किया। लगातार विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद सरकार ने अध्यादेश को आगे नहीं बढ़ाया। यह सरकार के शुरुआती वर्षों का पहला बड़ा राजनीतिक दबाव माना गया।

  1. किसान आंदोलन (2020-2021)

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हजारों किसान लगभग एक वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे। सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर आंदोलन के दौरान सैकड़ों किसानों की मौत की खबरें भी सामने आईं। आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ।

  1. अग्निपथ योजना विरोध (2022)

अग्निपथ योजना लागू होने के बाद बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, तेलंगाना समेत कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए। ट्रेनों में आगजनी हुई। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। इसके बावजूद सरकार अपने फैसले पर कायम रही। योजना वापस नहीं ली गई।

  1. पहलवान आंदोलन (2023)

ओलंपिक पदक विजेता पहलवान जंतर-मंतर पर बैठे। देशभर में समर्थन मिला। महापंचायतें हुईं। राजनीतिक दल भी खुले तौर पर आंदोलन के समर्थन में उतर आए। इसके बावजूद सरकार ने अपनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई जारी रखी लेकिन किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ।

  1. मणिपुर हिंसा

मणिपुर हिंसा को लेकर संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष ने सरकार को घेरा। अविश्वास प्रस्ताव तक लाया गया। सरकार पर लगातार सवाल उठे, लेकिन नेतृत्व में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया।

  1. NEET से पहले भी आंदोलन का चेहरा रहे सोनम वांगचुक (2024)

दरअसल, सोनम वांगचुक पहली बार किसी राष्ट्रीय मुद्दे को लेकर आंदोलन में नहीं उतरे थे। इससे पहले वर्ष 2024 में उन्होंने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करने, राज्य का दर्जा देने, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सुरक्षा और हिमालयी पर्यावरण की रक्षा की मांग को लेकर लेह में 21 दिन तक ‘क्लाइमेट फास्ट’ किया था। इस दौरान वे केवल पानी और नमक के सहारे शून्य से नीचे (सब-ज़ीरो) तापमान में खुले आसमान के नीचे बैठे रहे। बाद में वे ‘दिल्ली चलो’ पदयात्रा के साथ राजधानी पहुंचे, जहां उन्हें और उनके समर्थकों को दिल्ली सीमा पर हिरासत में लिया गया। इसके बाद दिल्ली में भी उन्होंने अनिश्चितकालीन अनशन किया, जो केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से वार्ता का लिखित आश्वासन मिलने के बाद समाप्त हुआ।

read more : सरकार से तीसरे दौर की वार्ता के बाद CJP ने खत्म किया आंदोलन, बोली- सरकार ने मान लीं हमारी प्रमुख मांगें

फिर NEET विवाद में क्या बदला?

यहीं से राजनीतिक विश्लेषण शुरू होता है। NEET-UG विवाद जो लगभग कई चरणों में हुआ जिसकी शुरुआत 20 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने NEET-UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं और जवाबदेही की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू किया। आंदोलन आगे बढ़ने के साथ देशभर के छात्र, अभिभावक और कई सामाजिक संगठनों का समर्थन मिलने लगा। 28 जून को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी आंदोलन में शामिल हुए और उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। जुलाई के पहले पखवाड़े में आंदोलन और तेज हुआ, कई राज्यों में प्रदर्शन हुए तथा 16 जुलाई को CJP ने वांगचुक के समर्थन में सामूहिक एकदिवसीय उपवास का आह्वान किया। वांगचुक की तबीयत लगातार बिगड़ने लगी लेकिन सरकार के तरफ से कोई आश्वासन तो दूर सरकार के प्रतिनिधि भी मिलने नहीं आये तभी 18 जुलाई को तड़के सुबह पुलिस जबरदस्ती सोनम वांगचुक को उठाती है और उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कर देती है, हालांकि पुलिस का कहे या सरकार का उनका यह दांव उल्टा पद गया और इस बात से आक्रोश में आकर देशभर के युवा जंतर मंतर पर उतर आए और CJP संस्थापक अभिजीत दीपके ने स्वयं भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की। इस दौरान 20 जुलाई को दिल्ली में ‘संसद चलो’ मार्च, पुलिस की बैरिकेडिंग, मेट्रो स्टेशनों के बंद होने, मोबाइल इंटरनेट पर पाबंदियों और प्रदर्शनकारियों के साथ झड़पों ने आंदोलन को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। सरकार और CJP के बीच कई दौर की वार्ता हुई। लगभग 26 दिन तक चली सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल लिखित आश्वासन मिलने के बाद समाप्त हुई, जबकि 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर के बाद CJP ने अपनी पहली प्रमुख मांग पूरी होने का दावा करते हुए जंतर-मंतर का आंदोलन वापस लेने की घोषणा की।

केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं था। इससे सीधे करोड़ों छात्रों, लाखों परिवारों और मध्यम वर्ग की उम्मीदें जुड़ी थीं। देश का लगभग हर राज्य इस परीक्षा से प्रभावित था। सोशल मीडिया पर छात्रों की आवाज तेजी से फैल रही थी। युवाओं की नाराजगी लगातार बढ़ रही थी। यही वजह है कि कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह मुद्दा सामान्य विरोध प्रदर्शन से कहीं बड़ा बन गया।

क्या युवाओं का दबाव सबसे बड़ा कारण बना?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आज का युवा केवल सड़क पर प्रदर्शन नहीं करता। वह सोशल मीडिया पर नैरेटिव भी बनाता है। यूट्यूब… इंस्टाग्राम… एक्स… टेलीग्राम… व्हाट्सएप… हर प्लेटफॉर्म पर NEET विवाद लगातार ट्रेंड करता रहा। ऐसे में सरकार के सामने केवल विपक्ष नहीं बल्कि डिजिटल जनमत भी एक बड़ी चुनौती बन गया। हालांकि यह कहना कि सरकार ने केवल इसी कारण फैसला लिया, बिना आधिकारिक पुष्टि के संभव नहीं है।

क्या चुनावी गणित भी एक वजह हो सकती है?

राजनीतिक विश्लेषण में यह भी चर्चा है कि भाजपा आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य के चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर नुकसान कम करने की रणनीति अपना सकती है। युवा मतदाता किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा वोट बैंक बन चुके हैं। यदि छात्रों का असंतोष लंबा खिंचता, तो इसका असर चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता था। हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर कभी नहीं कहा कि उसके फैसले चुनावी कारणों से जुड़े हैं।

ओडिशा फैक्टर कितना महत्वपूर्ण?

धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय से भाजपा के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। ओडिशा में पार्टी के विस्तार और संगठन को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती रही है। ऐसे में यदि उनके पद छोड़ने जैसी स्थिति बनती है, तो इसका असर केवल शिक्षा मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि ओडिशा की राजनीति पर भी नजर रखी जाएगी। हालांकि भाजपा का संगठन एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है और पार्टी नए नेतृत्व के साथ भी अपनी रणनीति आगे बढ़ा सकती है। क्या यह मोदी सरकार की नई राजनीतिक रणनीति है? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि युवा वर्ग से जुड़े मुद्दों को अब केवल कानून-व्यवस्था के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाएं अब सीधे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं।

मोदी सरकार के कार्यकाल में किसान आंदोलन, अग्निपथ विरोध, पहलवान आंदोलन और कई अन्य बड़े प्रदर्शन हुए। हर आंदोलन का स्वरूप अलग था और सरकार की प्रतिक्रिया भी अलग रही। यदि NEET विवाद के दौरान सरकार ने अलग रुख अपनाया है, तो उसके पीछे वास्तविक कारण क्या थे, इसका स्पष्ट उत्तर आने वाले समय में ही मिलेगा। फिलहाल इतना तय है कि युवाओं से जुड़े मुद्दे अब भारतीय राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं और आने वाले चुनावों में उनकी भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहने वाली है।

read more : ‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए’, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अभिजीत दीपके का पहला रिएक्शन

Youthwings