‘आज पौधा लगाओ, कल पेड़ कटवाओ’, विश्व पर्यावरण दिवस का सच…

विश्व पर्यावरण दिवस

आज 5 जून है। विश्व पर्यावरण दिवस। यानी वह दिन जब सोशल मीडिया पर पेड़ों की तस्वीरें लगाई जाएंगी, “सेव अर्थ” के नारे लगाए जाएंगे, पर्यावरण बचाने की लंबी-लंबी बातें होंगी और कुछ लोग पौधे लगाकर फोटो खिंचवाएंगे। कल से फिर वही पुरानी दिनचर्या शुरू हो जाएगी—पेड़ काटो, प्लास्टिक फैलाओ, नदियां गंदी करो और विकास के नाम पर प्रकृति का गला घोंटो।

विश्व पर्यावरण दिवस हर साल हमें याद दिलाने आता है कि पृथ्वी संकट में है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस पर्यावरण को बचाने की बातें आज मंचों से की जा रही हैं, उसी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में हम सब कहीं न कहीं भागीदार हैं। हम भाषणों में हरियाली चाहते हैं, लेकिन घर के सामने खड़ा पेड़ हमें परेशानी लगता है। हमें ऑक्सीजन चाहिए, लेकिन जंगल नहीं। हमें बारिश चाहिए, लेकिन पेड़ लगाने का समय नहीं।

विकास की कीमत: कटते जंगल, बढ़ते कंक्रीट के जंगल

आज शहरों में सीमेंट के जंगल तेजी से उग रहे हैं और असली जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं। विकास के नाम पर हजारों-लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। सड़क चौड़ी करनी हो तो पेड़ काटो, मॉल बनाना हो तो पेड़ काटो, कॉलोनी बसानी हो तो पेड़ काटो। ऐसा लगता है मानो पेड़ नहीं, विकास के रास्ते में खड़े अपराधी हों।

फिर उन्हीं कटे हुए पेड़ों की जगह एक छोटे से पौधे को लगाकर दावा किया जाता है कि “पर्यावरण संरक्षण का कार्य सफलतापूर्वक किया गया।” सबसे मजेदार बात यह है कि एक सौ साल पुराने वृक्ष को काटने में केवल कुछ घंटे लगते हैं, लेकिन उसकी भरपाई करने वाला पेड़ तैयार होने में कई दशक लग जाते हैं। मगर यह गणित शायद उन लोगों की समझ से बाहर है जो हरियाली को केवल रिपोर्ट और फाइलों में देखते हैं।

जहरीली होती हवा और बढ़ती बीमारियां

आज वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। शहरों की हवा धीरे-धीरे जहर बनती जा रही है। बच्चे मास्क पहनकर स्कूल जा रहे हैं, बुजुर्ग सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अस्पतालों में श्वास संबंधी रोगियों की संख्या बढ़ रही है।

लेकिन चिंता की बात नहीं है, क्योंकि हम हर साल पर्यावरण दिवस मना लेते हैं। शायद हमारे यहां समस्याओं का समाधान करने से ज्यादा उन्हें मनाने की परंपरा मजबूत है। जब तक प्रदूषण आंकड़ों और रिपोर्टों में सीमित रहता है, तब तक हम उसे गंभीरता से नहीं लेते।

नदियों का दर्द और जल प्रदूषण की त्रासदी

जल प्रदूषण की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। नदियां, जिन्हें कभी जीवनदायिनी कहा जाता था, आज कचरे और रासायनिक अपशिष्टों से भरी हुई हैं। उद्योग अपने अपशिष्ट जल को नदियों में छोड़ देते हैं और फिर जल संरक्षण पर सेमिनार आयोजित करते हैं।

यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति घर में आग लगाकर अग्निशमन दिवस मनाए। एक तरफ जल संरक्षण की बातें होती हैं और दूसरी तरफ जल स्रोतों को लगातार प्रदूषित किया जाता है। यह दोहरा व्यवहार हमारी पर्यावरणीय सोच पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

प्लास्टिक: सुविधा का सबसे बड़ा अभिशाप

प्लास्टिक का उपयोग भी पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। बाजार में जाएं तो हर सामान प्लास्टिक में पैक मिलेगा। सरकारें प्रतिबंध की घोषणा करती हैं, व्यापारी विकल्प खोजने की बात करते हैं और उपभोक्ता सुविधा के नाम पर सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं।

परिणाम यह है कि प्लास्टिक मिट्टी, जल और समुद्री जीवन के लिए अभिशाप बन चुका है। यह वर्षों तक नष्ट नहीं होता और धीरे-धीरे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन की दस्तक

जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर ऊपर उठ रहा है और मौसम का चक्र असंतुलित होता जा रहा है।

कभी भीषण गर्मी, कभी असामान्य वर्षा और कभी विनाशकारी बाढ़—प्रकृति मानो बार-बार चेतावनी दे रही है। लेकिन हम चेतावनी को समस्या नहीं, केवल समाचार समझकर आगे बढ़ जाते हैं। जब तक संकट हमारे दरवाजे तक नहीं पहुंचता, हम उसकी गंभीरता को स्वीकार नहीं करते।

क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?

पर्यावरण की दुर्दशा के लिए केवल सरकारों या उद्योगों को दोष देना भी उचित नहीं होगा। आम नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। हम सड़क पर कचरा फेंकते हैं, पानी बर्बाद करते हैं, बिजली का अनावश्यक उपयोग करते हैं और फिर उम्मीद करते हैं कि पर्यावरण अपने आप ठीक हो जाएगा।

हम चाहते हैं कि दुनिया बदले, लेकिन अपनी आदतें बदलने को तैयार नहीं हैं। पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत घर से होती है, लेकिन अक्सर हम इसकी जिम्मेदारी किसी और पर डाल देते हैं।

आत्ममंथन का अवसर

विश्व पर्यावरण दिवस हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी देता है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम सच में पर्यावरण को बचाना चाहते हैं या केवल उसकी चिंता करने का दिखावा करना चाहते हैं?

क्या वृक्षारोपण केवल फोटो खिंचवाने का माध्यम बन गया है? क्या पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रह गया है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से खोजे जाएं, तो शायद हमें अपनी भूमिका भी स्पष्ट दिखाई देगी।

भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी

सच्चाई यह है कि यदि पेड़ों की कटाई इसी गति से जारी रही, यदि नदियां इसी तरह प्रदूषित होती रहीं और यदि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इसी तरह चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

उन्हें शायद किताबों में पढ़ना पड़े कि कभी पृथ्वी पर घने जंगल हुआ करते थे, नदियों का पानी सीधे पीया जा सकता था और हवा में सांस लेने के लिए किसी यंत्र की जरूरत नहीं पड़ती थी।

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