नौकरी छिनी तो सड़क पर उतरे सर्वेयर्स, सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा… राजस्व मंत्री के घर तक पहुंचा युवाओं का गुस्सा

70 हजार युवाओं की जिंदगी पर संकट, अन्यायपूर्ण आदेश और बकाया भुगतान की उपेक्षा ने मजबूर किया आर-पार की लड़ाई के लिए

 

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार की राजस्व नीतियों के खिलाफ लोकल यूथ सर्वेयर्स का आक्रोश आज चरम पर पहुंच गया है। राजधानी भोपाल में बड़ी संख्या में पहुंचे युवा सर्वेयर्स ने राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा के बंगले का जोरदार घेराव किया। नौकरी बहाली, लंबित मानदेय के भुगतान और नियमितीकरण की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ तीखी नारेबाजी की और स्पष्ट संदेश दिया कि अब वे आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।

 

सरकार की इस घटना ने साफ तौर पर उजागर किया कि सत्ता में बैठे लोग युवाओं की मेहनत और बलिदान को कितनी आसानी से नजरअंदाज कर सकते हैं। पूरे प्रदेश में करीब 70 हजार युवा इन सेवाओं से जुड़े हुए थे। पिछले ढाई साल से विभाग इन युवाओं की सेवाएं लगातार ले रहा था। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मात्र ₹8 प्रति खसरा गिरदावरी की बेहद कम दर पर काम कराया गया। युवाओं ने कड़ी मेहनत से यह जिम्मेदारी निभाई, लेकिन सरकार ने अचानक एक झटके में उनकी उम्मीदों को कुचल दिया।

 

 28 अप्रैल का विवादास्पद आदेश, बिना नोटिस के सेवाएं समाप्त

 

मुख्य आक्रोश 28 अप्रैल 2026 को जारी उस आदेश को लेकर है, जिसमें बिना किसी पूर्व सूचना या ठोस कारण के इन 70 हजार लोकल यूथ सर्वेयर्स की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। यह फैसला न केवल अचानक था बल्कि युवाओं की आजीविका को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाला साबित हुआ। अचानक बेरोजगारी का सामना कर रहे इन युवाओं के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

 

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि विभाग ने उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया। कई युवाओं को पिछले 4 महीनों से तो कुछ को ढाई साल से अपना हक का मानदेय (पैसे) नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि अधिकारियों के चक्कर काटते-काटते उनकी चप्पलें घिस गईं, लेकिन किसी ने उनकी सुनी नहीं। यह स्थिति सरकार की संवेदनहीनता को उजागर करती है, जहां मेहनत करने वाले युवाओं को पसीने की कमाई से भी वंचित रखा गया।

 

युवाओं की लगातार उपेक्षा और खोखले आश्वासन

 

सर्वेयर्स का कहना है कि उन्होंने अपनी जायज मांगों को लेकर पहले भी कई बार मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपे, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ खोखले आश्वासन मिले। जब सब्र का बांध टूट गया, तब उन्होंने आंदोलन का रास्ता अपनाया। यह आंदोलन केवल एक घटना नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश सरकार की युवा नीति की असफलता का प्रतीक है।

 

सरकार पर आरोप है कि उसने सस्ते श्रम का फायदा उठाया लेकिन जब नियमितीकरण या उचित पारिश्रमिक की बात आई तो मुंह मोड़ लिया। ₹8 प्रति खसरा जैसी मामूली दर पर काम कराने के बावजूद बकाया भुगतान न करना युवा शोषण की पराकाष्ठा है। ढाई साल की निरंतर सेवा के बाद अचानक छुट्टी देना न केवल अनैतिक है बल्कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

 

राजस्व मंत्री के बंगले के बाहर भारी पुलिस बल तैनात है। प्रशासन प्रदर्शनकारियों को समझाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन युवा अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। यह दृढ़ता दिखाती है कि युवा अब सिर्फ आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होने वाले।

सरकार की जिम्मेदारी

 

यह घटना मध्य प्रदेश सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। 70 हजार युवा परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। यदि सरकार समय रहते इन मांगों पर ध्यान नहीं देती तो आंदोलन और फैल सकता है। युवाओं को सस्ते श्रम के रूप में इस्तेमाल करना और फिर बिना सहायता छोड़ देना विकास के दावों पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।

 

सरकार को पारदर्शिता बरतनी चाहिए। आदेश जारी करने से पहले युवाओं से चर्चा करनी चाहिए थी। बकाया भुगतान रोकना न केवल नैतिक रूप से गलत है बल्कि कानूनी रूप से भी चुनौती भरा हो सकता है। नियमितीकरण की मांग उचित है क्योंकि लंबे समय से सेवा दे रहे युवा स्थायी समाधान की उम्मीद रखते हैं।

 

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