SIR Supreme Court Verdict: SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘फ्री एंड फेयर चुनाव जरूरी’, प्रक्रिया को गैर-संवैधानिक मानने से किया इनकार
SIR Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों के तहत किया काम, SIR प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता
SIR Supreme Court Verdict: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि सिर्फ अलग प्रक्रिया होने की वजह से इसे गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता। फैसले में कई अहम टिप्पणियां भी की गई हैं, जो चुनावी व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकती हैं। पढ़िए पूरी खबर…
SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, प्रक्रिया को संवैधानिक मानते हुए याचिकाएं खारिज
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई यह प्रक्रिया संवैधानिक दायरे में है और इसे केवल इसलिए गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया से अलग है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का प्रयोग कानून के तहत किया है और वह अपनी सीमाओं से बाहर जाकर कार्य नहीं कर रहा है। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है और इस दिशा में उठाए गए कदमों को केवल प्रक्रिया के आधार पर असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
चुनाव आयोग ने अधिकारों का किया इस्तेमाल
फैसले के दौरान अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों का उपयोग किया है और SIR प्रक्रिया को पूरी तरह गैर-संवैधानिक नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाए रखने के लिए आयोग को समय-समय पर ऐसे कदम उठाने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रक्रिया की अलग प्रकृति अपने आप में उसे अवैध नहीं बनाती।
कोर्ट के अनुसार, चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना लोकतंत्र की मूल आवश्यकताओं में शामिल है।
SIR के दौरान उठाए गए कदमों पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कुछ पक्षों ने तर्क दिया था कि SIR प्रक्रिया में मतदाताओं पर स्वयं को साबित करने का अतिरिक्त बोझ डाला गया है। हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से अलग किसी अन्य जगह रहने लगा हो, तब भी वह पुरानी प्रक्रिया या रिकॉर्ड से पूरी तरह बाहर नहीं हो जाता।
अदालत ने कहा कि SIR के दौरान किसी व्यक्ति का नाम सूची से हटना अपने आप में नियमों के खिलाफ नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप कदम उठाए हैं।
दस्तावेजों की जांच को मनमाना नहीं कहा जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर निर्णय लिया है।
अदालत के अनुसार दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया को मनमाना नहीं कहा जा सकता। यदि किसी दस्तावेज को लेकर आयोग को संदेह होता है तो उसे वोटर सूची में शामिल करने से इनकार करने का अधिकार है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता तय कर रहा है।
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग का कार्य केवल चुनावी रिकॉर्ड और मतदाता सूची से जुड़ा है।
संविधान की कसौटी पर खरा उतरा SIR
फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि SIR संविधान और संबंधित कानूनों की कसौटी पर खरा उतरता है।
कोर्ट ने माना कि यह एक विस्तृत और जटिल प्रक्रिया है, इसलिए चुनाव आयोग को नियम और प्रक्रियाएं तय करने का अधिकार प्राप्त है।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता, हालांकि संदिग्ध मामलों को वह संबंधित केंद्रीय एजेंसियों या सरकार के पास भेज सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के प्रबंधन के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर चुनावी व्यवस्थाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी देखने को मिल सकता है।
