राम रहीम पर BJP सरकार की “विशेष कृपा” ! 9 साल में 16वीं बार जेल से बाहर आया डेरा प्रमुख, इस “दरियादिली” पर उठने लगे कई सवाल

राम रहीम

हरियाणा की भाजपा सरकार एक बार फिर डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। साध्वियों के यौन शोषण और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड जैसे गंभीर मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे राम रहीम को एक बार फिर 30 दिन की पैरोल दे दी गई है। मंगलवार सुबह रोहतक की सुनारिया जेल से कड़ी सुरक्षा के बीच उसे बाहर निकाला गया और वह सीधे सिरसा डेरे के लिए रवाना हो गया। हालांकि इस बार प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम को बेहद शांत और गोपनीय तरीके से अंजाम दिया।

सुबह करीब 6 बजकर 34 मिनट पर राम रहीम जेल से बाहर निकला। हैरानी की बात यह रही कि हर बार की तरह इस बार न तो ज्यादा सुरक्षा का दिखावा नजर आया और न ही प्रशासन की तरफ से कोई विशेष जानकारी सार्वजनिक की गई। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक सजायाफ्ता कैदी को इतनी बार जेल से बाहर आने की अनुमति कैसे मिल जाती है, जबकि आम कैदियों को छोटी-छोटी वजहों पर भी राहत नहीं मिलती।

9 साल में 16वीं बार जेल से बाहर

अगस्त 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद से गुरमीत राम रहीम सुनारिया जेल में बंद है, लेकिन जेल से ज्यादा समय वह पैरोल और फरलो पर बाहर बिताता नजर आया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले करीब 9 वर्षों में वह 16 बार जेल से बाहर आ चुका है। इतना ही नहीं, कुल मिलाकर करीब 430 दिन वह जेल से बाहर रह चुका है।

जनवरी 2026 में भी उसे 40 दिन की पैरोल मिली थी और फरवरी में वह वापस जेल लौटा था। अब कुछ ही महीनों बाद फिर 30 दिन की राहत मिल गई। ऐसे में विपक्ष और सामाजिक संगठनों का सवाल है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग तरीके से लागू होते हैं?

सरकार की “दरियादिली” पर उठे सवाल

हरियाणा सरकार लगातार यह कहती रही है कि पैरोल और फरलो जेल नियमों के तहत दी जाती है, लेकिन राम रहीम के मामले में बार-बार राहत मिलने से सरकार की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक हो गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनावी समय और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए सरकार डेरा समर्थकों को साधने की कोशिश करती रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरियाणा और पंजाब की राजनीति में डेरा समर्थकों का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में हर बार चुनावों से पहले या महत्वपूर्ण राजनीतिक समय पर राम रहीम को राहत मिलने से सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होना लाजिमी है।

क्या आम कैदियों को भी मिलती है इतनी राहत?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी आम कैदी को भी इतनी आसानी से बार-बार पैरोल मिलती है? जेल नियमों के मुताबिक कोई भी कैदी 70 से 100 दिन तक पैरोल और फरलो का लाभ ले सकता है, लेकिन राम रहीम के मामले में राहत का सिलसिला लगातार जारी है। इस साल की बात करें तो पैरोल और फरलो मिलाकर वह लगभग तय सीमा तक पहुंच चुका है।

सूत्रों के मुताबिक इस बार राम रहीम ने “अच्छे आचरण” का हवाला देते हुए जमानत की अर्जी भी दी है। हालांकि प्रशासन ने पैरोल के साथ कुछ शर्तें भी लगाई हैं। उसे सार्वजनिक सभा करने की अनुमति नहीं होगी और वह डेरे से बाहर नहीं जा सकेगा। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या पहले लगी पाबंदियों का पूरी तरह पालन हुआ था?

गंभीर अपराधों के बावजूद लगातार राहत

गुरमीत राम रहीम पर लगे आरोप मामूली नहीं हैं। वह दो साध्वियों के यौन शोषण और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या जैसे मामलों में दोषी ठहराया जा चुका है। अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बावजूद लगातार पैरोल मिलने से पीड़ित परिवारों और सामाजिक संगठनों में नाराजगी बढ़ती रही है।

कई बार यह भी देखा गया कि पैरोल के दौरान राम रहीम ऑनलाइन सत्संग, वीडियो संदेश और अन्य गतिविधियों के जरिए अपने समर्थकों से जुड़ा रहा। ऐसे में यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या पैरोल वास्तव में सुधार और पारिवारिक जरूरतों के लिए दी जा रही है या इसका इस्तेमाल प्रभाव बनाए रखने के लिए हो रहा है?

चुपचाप रिहाई और बढ़ती राजनीतिक बहस

इस बार राम रहीम को बेहद चुपचाप जेल से बाहर निकाला गया। प्रशासन शायद किसी विवाद या विरोध से बचना चाहता था, लेकिन मामला फिर भी राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक लोग यही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर सरकार की यह “विशेष कृपा” कब तक जारी रहेगी?

एक तरफ आम जनता कानून के सख्त पालन की उम्मीद करती है, वहीं दूसरी तरफ बार-बार पैरोल मिलने से न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। अब देखना होगा कि सरकार इस फैसले पर उठ रहे सवालों का जवाब कैसे देती है और क्या भविष्य में पैरोल प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्ट और समान नीति बनाई जाएगी या नहीं।

Youthwings