होर्मुज खुलने के बाद भी तुरंत सस्ता नहीं होगा तेल, ट्रंप के दावों पर क्यों भरोसा नहीं कर रहा बाजार?
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान के साथ तनाव कम होने की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जल्द पूरी तरह खुल सकता है। लेकिन वैश्विक बाजार इन बयानों को लेकर अब पहले जैसा उत्साह नहीं दिखा रहा। वजह साफ है—पिछले कुछ महीनों में कई बार शांति और समझौते की बातें सामने आईं, मगर हालात फिर बिगड़ते चले गए। यही कारण है कि निवेशक अब केवल राजनीतिक बयानों पर भरोसा करने के बजाय जमीनी स्थिति को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित करता है। हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने सीधे युद्ध से ज्यादा दबाव इस समुद्री मार्ग के जरिए बनाया। स्पीडबोट, समुद्री माइन्स और ड्रोन की मदद से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई, जिसका असर तुरंत वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई दिया। तेल की कीमतों में तेज उछाल आया और कई देशों में ईंधन महंगा हो गया।
अब सवाल यह है कि अगर होर्मुज फिर से खुल भी जाता है, तो क्या हालात तुरंत सामान्य हो जाएंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा होना बेहद मुश्किल है। तेल बाजार में स्थिरता लौटने में लंबा समय लग सकता है और कीमतें जल्द पुराने स्तर पर लौटती नहीं दिख रहीं।
पहला चरण : फंसे टैंकरों को निकालना बड़ी चुनौती
फारस की खाड़ी में इस समय बड़ी संख्या में तेल टैंकर फंसे हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 166 टैंकर ऐसे हैं जिनमें लगभग 17 करोड़ बैरल तेल भरा हुआ है। इन्हें सुरक्षित तरीके से बाहर निकालना आसान काम नहीं होगा। समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित घोषित होने के बाद भी टैंकर कंपनियां बेहद सावधानी से आगे बढ़ेंगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारी-भरकम टैंकर बहुत धीमी गति से चलते हैं। ऐसे में बंद पड़े मार्ग को सामान्य स्तर पर लाने में कई हफ्तों से लेकर महीनों तक का समय लग सकता है। खाली टैंकरों को अंदर भेजना, तेल लोड करना और फिर उन्हें सुरक्षित बाहर निकालना एक लंबी प्रक्रिया होगी। अनुमान है कि पूरी क्षमता के साथ तेल परिवहन दोबारा शुरू होने में कम से कम दो से तीन महीने लग सकते हैं।
दूसरा चरण : भरे हुए स्टॉक नई समस्या
युद्ध के दौरान तेल उत्पादक देशों के सामने सबसे बड़ी परेशानी स्टोरेज की थी। तेल निर्यात बाधित होने की वजह से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल भंडारण केंद्रों में जमा हो गया। अब जब रास्ता खुलेगा, तो सबसे पहले यही जमा तेल बाजार में भेजा जाएगा।
हालांकि कुछ राहत की बात यह है कि कई रिफाइनरियों ने अपनी स्टोरेज क्षमता पूरी तरह नहीं भरी थी। इससे सप्लाई चेन को थोड़ा सहारा मिल सकता है। लेकिन भारी मात्रा में जमा तेल होने के कारण नया उत्पादन बढ़ाने में देरी होगी। कंपनियां पहले पुराने स्टॉक को निकालने पर ध्यान देंगी, जिससे बाजार में संतुलन बनने में समय लगेगा।
तीसरा चरण : तेल उत्पादन दोबारा शुरू करना आसान नहीं
मिडिल ईस्ट के कई बड़े तेल कुओं को संघर्ष के दौरान बंद कर दिया गया था। इन कुओं को दोबारा चालू करना किसी मशीन का बटन दबाने जितना आसान नहीं होता। इसके पीछे जटिल इंजीनियरिंग और तकनीकी प्रक्रिया होती है।
तेल कुओं में पानी, गैस और दबाव का संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। अगर जल्दबाजी में उत्पादन शुरू किया गया तो रिजर्वायर को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। कई मामलों में फिर से ड्रिलिंग करनी पड़ सकती है, जिसमें भारी लागत और समय लगता है।
इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में कई तेल क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए अलग-अलग कंपनियों और देशों को मिलकर काम करना होगा। किसी एक जगह तकनीकी गड़बड़ी पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि उत्पादन सामान्य स्तर पर लौटने में कई सप्ताह या महीनों का समय लग सकता है।
चौथा चरण : युद्ध में तबाह हुई सुविधाओं की मरम्मत
संघर्ष के दौरान केवल तेल कुएं ही प्रभावित नहीं हुए, बल्कि कई रिफाइनरी, गैस प्लांट और प्रोसेसिंग यूनिट्स को भी नुकसान पहुंचा है। इनमें से कुछ संरचनाओं की मरम्मत में काफी लंबा समय लग सकता है। बताया जा रहा है कि मिडिल ईस्ट में करीब 1.2 करोड़ बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल और लगभग 30 लाख बैरल रिफाइंड उत्पादों का उत्पादन प्रभावित हुआ है। खासतौर पर सऊदी अरब और इराक जैसे बड़े उत्पादक देशों में उत्पादन फिर से सामान्य करना आसान नहीं होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत, सुरक्षा जांच और तकनीकी परीक्षण पूरे होने के बाद ही सप्लाई पूरी तरह बहाल हो पाएगी।
ट्रंप के शांति दावों पर बाजार क्यों नहीं कर रहा भरोसा?
पिछले कुछ महीनों में कई बार अमेरिकी नेतृत्व की ओर से शांति और समझौते के दावे किए गए, लेकिन हर बार हालात दोबारा बिगड़ गए। इसी वजह से निवेशकों और ट्रेडर्स के बीच भरोसे की कमी बनी हुई है। एक समय ऐसा भी आया जब यह कहा गया कि ईरान होर्मुज में आवाजाही सामान्य करने को तैयार हो गया है, लेकिन कुछ ही घंटों बाद फिर तनाव बढ़ गया। इसके बाद बाजार ने यह समझ लिया कि केवल बयानबाजी के आधार पर जोखिम लेना सही नहीं होगा।
इसके अलावा कई बड़े सवाल अभी भी अनसुलझे हैं। क्या ईरान जहाजों पर अतिरिक्त नियंत्रण या शुल्क लगाना बंद करेगा? क्या अमेरिका ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील देगा? क्या समुद्री बीमा कंपनियां फिर पहले जैसे सामान्य प्रीमियम पर कवरेज देंगी? इन सभी सवालों का जवाब अभी साफ नहीं है।
बीमा कंपनियों ने युद्ध के दौरान समुद्री बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी कर दी थी। अब जहाज मालिक तब तक सामान्य संचालन शुरू करने से बचेंगे, जब तक उन्हें पूरी सुरक्षा का भरोसा नहीं मिल जाता। यही वजह है कि होर्मुज खुलने के बाद भी “फ्री शिपिंग” जैसी पुरानी स्थिति लौटना मुश्किल माना जा रहा है।
तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट फिलहाल मुश्किल
वैश्विक बाजार में फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आने वाले समय में हालात स्थिर भी रहे, तब भी तेल तुरंत सस्ता नहीं होगा। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का अनुमान है कि सालभर औसत तेल कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी इसका असर दिखाई देगा। बाजार को अब केवल शांति घोषणा नहीं, बल्कि लगातार स्थिरता और भरोसेमंद सप्लाई चाहिए।
भरोसे की कमी सबसे बड़ी चुनौती
पूरे संकट में सबसे अहम मुद्दा भरोसे का बन गया है। बाजार यह मानने को तैयार नहीं कि केवल राजनीतिक समझौते से सबकुछ तुरंत सामान्य हो जाएगा। समुद्री सुरक्षा, बीमा, सप्लाई चेन, उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध—इन सभी मोर्चों पर स्थिरता जरूरी है।
यही कारण है कि भले ही होर्मुज दोबारा खुल जाए, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था को महंगे तेल का असर कुछ समय तक झेलना पड़ सकता है। आने वाले महीनों में असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या क्षेत्र में शांति लंबे समय तक कायम रह पाती है या नहीं।
