अब पेट्रोल में ज्यादा एथेनॉल! क्या पुरानी बाइक-कारों के लिए खतरा बन रहा नया पेट्रोल?
मोदी सरकार की E30 एथेनॉल नीति… इंजन खराब कर रही पावर पेट्रोल! इस खबर में जानिए आपकी गाड़ी को होगा कितना नुकसान?
भारत सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। मई 2026 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने E22, E25, E27 और E30 जैसे उच्च एथेनॉल ब्लेंड वाले ईंधन के नए मानक अधिसूचित किए, जो 15 मई 2026 से लागू हो गए हैं। फिलहाल देश में E20 (20% एथेनॉल) बिक रहा है, लेकिन सरकार E30 तक चरणबद्ध तरीके से पहुंचने का दावा कर रही है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कई पेट्रोल पंपों पर अब केवल पावर पेट्रोल (उच्च एथेनॉल मिश्रित) ही उपलब्ध है। इससे दोपहिया और पुरानी चारपहिया गाड़ियों के मालिकों में आक्रोश फैल गया है। आलोचकों का आरोप है कि मोदी सरकार की यह नीति तेल आयात कम करने और प्रदूषण घटाने के नाम पर आम जनता और वाहन मालिकों पर बोझ बन गई है।
सरकार के दावे और हकीकत
सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल पर निर्भरता घटेगी, विदेशी मुद्रा बचत होगी और किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी। नीति आयोग की रिपोर्ट के आधार पर E20 लक्ष्य 2030 से पहले हासिल कर लिया गया। एथेनॉल उत्पादन क्षमता अब करीब 2 अरब लीटर तक पहुंच चुकी है। पहले यह गन्ने से बनता था, अब मक्का, टूटे चावल और अन्य अनाजों से भी उत्पादन बढ़ाया जा रहा है।
सरकार दावा करती है कि इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा और पर्यावरण को फायदा मिलेगा। लेकिन विपक्ष और विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति बिना पर्याप्त तैयारी के थोपी जा रही है। रायपुर जैसे शहरों में बिना विकल्प दिए केवल हाई ब्लेंड पेट्रोल उपलब्ध कराना आम लोगों के साथ अन्याय है।
एथेनॉल मिश्रण इंजन के लिए कितना अच्छा और कितना खराब?
एथेनॉल की ऑक्टेन रेटिंग बहुत ऊंची (108-110 RON) होती है, जिससे इंजन में नॉकिंग कम होती है और दहन बेहतर होता है। ऑक्सीजन की मौजूदगी के कारण CO, हाइड्रोकार्बन और पार्टिकुलेट उत्सर्जन घटता है। आधुनिक गाड़ियों (2023 के बाद की) में एथेनॉल-प्रतिरोधी पार्ट्स लगे होते हैं, इसलिए E20-E25 तक प्रदर्शन अपेक्षाकृत ठीक रह सकता है। कुछ मामलों में थोड़ी बेहतर पावर भी मिल सकती है।
नकारात्मक प्रभाव
एथेनॉल की ऊर्जा घनत्व शुद्ध पेट्रोल से 30-35% कम है। E20 में 6-10% तक माइलेज गिरावट आम है। पुरानी गाड़ियों में यह और ज्यादा देखा जा रहा है। नतीजा यह कि उपभोक्ताओं को प्रति किलोमीटर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।
एथेनॉल हाइग्रोस्कोपिक (नमी सोखने वाला) होता है। इससे फ्यूल टैंक, पाइप, रबर सील, होज, कार्बोरेटर और इंजेक्टर में जंग और संक्षारण होता है। पुरानी गाड़ियों में फ्यूल लीक, फिल्टर क्लॉगिंग, रफ आइडलिंग और हार्ड स्टार्टिंग की शिकायतें बढ़ गई हैं। ठंडे मौसम में स्टार्टिंग और भी मुश्किल हो जाती है।
रखरखाव का खर्च बढ़ गया है। कई वाहन कंपनियां पुरानी गाड़ियों पर E20+ के लिए वारंटी क्लेम नहीं मान रही हैं। E25-E30 और ज्यादा आक्रामक होगा। विशेषज्ञ चेतावते हैं कि भारत में चल रही बहुसंख्यक पुरानी दोपहिया और चारपहिया गाड़ियों के इंजन इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे।
रायपुर के वाहन मालिकों ने बताया कि पावर पेट्रोल भरने के बाद माइलेज 8-12% तक गिर गया है और इंजन में असामान्य आवाज आने लगी है।
किसानों को फायदा पहुंचाने का दावा किया जा रहा है, लेकिन पानी की कमी वाले छत्तीसगढ़ में गन्ना-मक्का उत्पादन बढ़ाने से फूड vs फ्यूल का संकट पैदा हो सकता है। राज्य सरकार ने E30 के प्रभाव का कोई सार्वजनिक आकलन रिपोर्ट अभी तक जारी नहीं की है।
आर्थिक रूप से तेल आयात बचत का दावा सही हो सकता है, लेकिन आम उपभोक्ता की प्रभावी ईंधन लागत बढ़ गई है। पुरानी गाड़ियों का रीसेल वैल्यू घट रहा है। चीनी मिलों और बायोफ्यूल कंपनियों को फायदा हो रहा है, जबकि छोटे किसान और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
पर्यावरण के लिहाज से उत्सर्जन में कुछ कमी जरूर है, लेकिन पूर्ण जीवन-चक्र विश्लेषण में पानी की अधिक खपत और फसल विविधता पर नकारात्मक असर भी सामने आता है।
मोदी सरकार की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से दूरगामी हो सकती है, लेकिन क्रियान्वयन में जल्दबाजी और उपभोक्ता-विरोधी तत्व साफ दिखते हैं।
E30 की तैयारी सराहनीय है, लेकिन आम जनता की बलि चढ़ाकर नहीं। यदि सरकार समय रहते सुधार नहीं करती तो यह नीति “आत्मनिर्भर भारत” की बजाय “जनता पर हमला” के रूप में याद की जाएगी।
