बस्तर में Mission 2026 का एंड गेम में अब टॉप 10 नक्सली निशाने पर,समझिए अब तक का पूरा ऑपरेशन कब और कैसे आगे बढ़ा
बस्तर में Mission 2026 का एंड गेम
बस्तर : छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के सफाए का एलान किया था, और इसी डेडलाइन को ध्यान में रखते हुए बस्तर संभाग में सुरक्षा बलों ने अंतिम चरण का अभियान शुरू कर दिया है। इस फाइनल पुश को ‘Mission 2026: The End Game’ नाम दिया गया है। बस्तर पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों का दावा है कि अब फोकस गिनती के बचे शीर्ष नक्सली नेताओं और उनके साथियों पर है। कोर इलाकों अबूझमाड़ और नेशनल पार्क क्षेत्र में इस वक्त अलग-अलग फोर्स के हजारों जवान लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच चुकी है, संगठन की रीढ़ टूट चुकी है और अब अंतिम लक्ष्य बस्तर से वामपंथी उग्रवाद का पूर्ण उन्मूलन है।
अमित शाह की डेडलाइन और बस्तर में अंतिम अभियान
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अक्टूबर 2024 से लेकर फरवरी 2026 तक कई मंचों से यह दावा दोहराया कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद छत्तीसगढ़, खासकर बस्तर संभाग, में ऑपरेशनों की रफ्तार और गहराई दोनों बढ़ा दी गई। 21 मार्च 2026 तक आते-आते यह पूरा अभियान अब “End Game” फेज में पहुंच चुका है, जहां सुरक्षा बलों का फोकस अब व्यापक combing से ज्यादा बचे हुए शीर्ष कमांडरों, उनके सुरक्षा घेरे और संभावित ठिकानों पर केंद्रित है। आधिकारिक और पुलिस इनपुट्स से यही संकेत मिलता है कि नक्सल नेटवर्क अब पहले की तुलना में बहुत सिमट चुका है, लेकिन कोर जंगल क्षेत्रों में उसका अवशेष अभी भी मौजूद है।
‘Mission 2026: The End Game’ क्या है
बस्तर से वामपंथी उग्रवाद के पूर्ण खात्मे के लिए चल रहे अंतिम चरण के अभियान को ‘Mission 2026: The End Game’ नाम दिया गया है। इस मिशन का उद्देश्य केवल नक्सली घटनाओं को कम करना नहीं, बल्कि बस्तर से माओवादी ढांचे का पूरी तरह समापन सुनिश्चित करना है। 31 मार्च 2026 की समय-सीमा से ठीक पहले अबूझमाड़ और नेशनल पार्क जैसे कठिन और लंबे समय तक नक्सलियों के सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में लगातार ऑपरेशन किए जा रहे हैं। हजारों जवान जंगल के भीतर मौजूद हैं और उनका फोकस खासकर उन पॉकेट्स पर है, जहां बचे हुए शीर्ष नक्सलियों के छिपे होने की संभावना है।
IGP सुंदरराज का दावा—अब निर्णायक एंड गेम का समय
बस्तर रेंज के आईजीपी सुंदरराज पी. के मुताबिक, मिशन 2026 अब अपने निर्णायक एंड गेम चरण में है और मुख्य लक्ष्य बस्तर से वामपंथी उग्रवाद का पूर्ण समापन सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में बस्तर पुलिस, डीआरजी, बस्तर फाइटर्स, एसटीएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और सीएएफ के समन्वित और इंटेलिजेंस आधारित अभियानों ने माओवादी ढांचे को भीतर तक कमजोर कर दिया है। उनके मुताबिक, प्रभावी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के कारण बड़ी संख्या में कैडर मुख्यधारा में लौटे हैं, जिससे संगठन की रीढ़ लगभग टूट चुकी है।
अब फोकस गिनती के बचे टॉप लीडरों पर
सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर अब 2 सेंट्रल कमेटी मेंबर समेत टॉप 10 मोस्ट वॉन्टेड नक्सली और उनके करीब 50 साथी हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार, केवल छत्तीसगढ़ में ही इन पर 3 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित है। यानी अब ऑपरेशन का स्वरूप बदल चुका है—पहले जहां बड़े पैमाने पर नेटवर्क तोड़ने, कैम्प ध्वस्त करने और movement corridor बंद करने पर जोर था, वहीं अब रणनीति सीधे शीर्ष नेतृत्व, उनके close protection units और बचे हुए सशस्त्र कैडर पर केंद्रित है।
मोस्ट वॉन्टेड सूची में कौन-कौन शामिल
सबसे ऊपर नाम आता है मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति उर्फ रमन्ना का, जो पोलित ब्यूरो और सलाहकार सेंट्रल कमेटी का सदस्य बताया जाता है। उसके बाद मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, जो पोलित ब्यूरो सदस्य है और उस पर छत्तीसगढ़ में 40 लाख रुपये का इनाम घोषित है।
इसी सूची में बस्तर क्षेत्र से जुड़े बड़े नामों में पापाराव कुड़म उर्फ सुन्नम चंद्रैया उर्फ मंगू दादा उर्फ चन्द्रना शामिल है, जो एसजेडसीएम मेंबर और दक्षिण सब-जोनल ब्यूरो प्रमुख बताया जाता है। इसके अलावा केसा सोढ़ी, जो डीकेएसजेडसी मेंबर, सीवायपीसीएम कमांडर, कंपनी नंबर 2 और पीएलजीए बटालियन नंबर 1 से जुड़ा माना जाता है, वह भी सुरक्षा एजेंसियों की हिट लिस्ट में है।
अन्य इनामी और वांछित नक्सलियों में हेमला विज्जा, चंदर कतलाम, किशोर उर्फ आयतु डोडी, रूपी पति विजय रेड्डी, मगेंश परचापी उर्फ सोमलू और मनीषा कोर्राम जैसे नाम शामिल हैं। पुलिस के मुताबिक, इन पर 5 लाख से 8 लाख रुपये तक के इनाम घोषित हैं और इन्हें लगातार आत्मसमर्पण के लिए कहा जा रहा है।
सिर्फ मुठभेड़ नहीं, समर्पण के लिए भी दबाव
अभियान का एक बड़ा हिस्सा अब सिर्फ combing operation नहीं, बल्कि psychological pressure and surrender push भी है। पुलिस के अलावा नक्सलियों के परिजन भी बचे हुए कैडरों से लगातार समर्पण की अपील कर रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि संगठन की भर्ती लगभग रुक चुकी है, लॉजिस्टिक सपोर्ट कमजोर पड़ चुका है और लगातार दबाव की वजह से निचले और मध्यम स्तर के कैडरों का मनोबल भी टूट रहा है। यही वजह है कि अंतिम चरण में एक ओर core areas में aggressive operation चल रहे हैं, तो दूसरी ओर surrender और rehabilitation policy को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।
भर्ती ठहरी, ठिकाने टूटे, नेटवर्क कमजोर पड़ा
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने जिस तरह इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन, एरिया डॉमिनेशन, भीतरी क्षेत्रों तक पैठ और समन्वित कार्रवाई को बढ़ाया है, उससे नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने लगातार खत्म हुए हैं। पहले जिन जंगल क्षेत्रों को उनका अभेद्य गढ़ माना जाता था, वहां अब सुरक्षा बल sustained presence बना चुके हैं। पुलिस का दावा है कि इसी वजह से नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच गई है। नेतृत्व, रसद, संपर्क और स्थानीय support structure—चारों स्तर पर दबाव बढ़ने से संगठन पहले जैसा विस्तार नहीं कर पा रहा।
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सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2024 से अक्टूबर 2024 तक छत्तीसगढ़ में 237 नक्सली मारे गए, 812 गिरफ्तार हुए और 723 ने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद अभियान और तेज हुआ। सरकारी दावों के अनुसार, राज्य में सरकार बनने के बाद से 2100 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, 1785 गिरफ्तार हुए और 477 मारे गए। वहीं केंद्रीय स्तर पर 2025 की समीक्षा में कहा गया कि उस वर्ष 317 नक्सली neutralise किए गए, 800 से अधिक गिरफ्तार हुए और करीब 2,000 ने surrender किया। यह आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि छत्तीसगढ़ और उससे जुड़े सीमावर्ती इलाकों में anti-Naxal campaign सबसे तीव्र चरण में रहा।
फिर भी सबसे बड़ा सवाल—कितने नक्सली अभी बचे हैं?
यहीं तस्वीर थोड़ी धुंधली हो जाती है। सरकार ने मारे गए, गिरफ्तार और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के आंकड़े जारी किए हैं, लेकिन 21 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ में बचे नक्सलियों की सटीक संख्या, कुल registered cadre, कितने वर्दीधारी, और कितने हथियारबंद — इसका कोई स्पष्ट सार्वजनिक आधिकारिक breakup उपलब्ध नहीं है। हालांकि बस्तर पुलिस के हालिया इनपुट से यह जरूर संकेत मिलता है कि अब फोकस टॉप 10 लीडर और उनके लगभग 50 साथियों पर सिमट गया है। यह संख्या यह बताने के लिए काफी है कि नेटवर्क अब पहले जैसा विशाल नहीं रह गया, लेकिन “इतने ही नक्सली बचे हैं” जैसी अंतिम और आधिकारिक संख्या अब भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में साफ तौर पर दर्ज नहीं है।
सबसे बड़े ऑपरेशन कौन-से रहे
2025 में सबसे ज्यादा चर्चा Karreguttalu Hill (KGH) operation की हुई, जिसे सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा अभियान बताया। छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर चले इस ऑपरेशन में 31 वर्दीधारी नक्सली मारे गए और कई हथियार बरामद किए गए। यह कार्रवाई करीब 21 दिनों तक चली, इसलिए इसे उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर सबसे लंबा और सबसे व्यापक sustained anti-Naxal operation माना जा रहा है।
इसके अलावा Operation Black Forest भी बड़ा turning point साबित हुआ। इसी दौर में सुरक्षा बलों ने CPI (Maoist) के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू को नारायणपुर क्षेत्र में मार गिराया। यह कार्रवाई इसलिए सबसे अहम मानी गई क्योंकि बसवराजू संगठन का शीर्ष रणनीतिक चेहरा था और उसकी मौत को नक्सल नेतृत्व की कमर तोड़ने वाली घटना माना गया।
टॉप लीडरशिप पर वार ने बदला खेल
21 मई 2025 को बसवराजू का मारा जाना नक्सल अभियान का सबसे बड़ा मोड़ माना गया। इसके बाद जनवरी 2026 में सेंट्रल कमेटी सदस्य अनल उर्फ पतिराम मांझी भी संयुक्त ऑपरेशन में ढेर कर दिया गया। इन दो बड़ी कार्रवाइयों ने यह संकेत दिया कि रणनीति अब निचले स्तर की मुठभेड़ों से आगे बढ़कर top command structure को dismantle करने पर केंद्रित है। इसका असर यह हुआ कि बचे हुए कैडर या तो छिपने को मजबूर हुए, या फिर surrender के दबाव में आए।
किन इलाकों में चल रहा सबसे ज्यादा दबाव
मौजूदा दौर में सबसे अधिक दबाव अबूझमाड़, नेशनल पार्क क्षेत्र, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, कांकेर और सीमावर्ती जंगल क्षेत्रों में देखा जा रहा है। इनमें से अबूझमाड़ और नेशनल पार्क क्षेत्र को लंबे समय तक नक्सलियों का core shelter zone माना जाता रहा है। अब ‘Mission 2026: The End Game’ के तहत फोर्स इन्हीं इलाकों में deep penetration operations कर रही है ताकि बचे हुए लीडर और उनके armed escorts के लिए कोई सुरक्षित रास्ता न बचे।
कौन-कौन सी फोर्स मैदान में हैं
इस अंतिम चरण के अभियान में बस्तर पुलिस, DRG, Bastar Fighters, STF, CRPF, BSF, ITBP, SSB और CAF समेत कई इकाइयां समन्वित रूप से लगी हुई हैं। यही multi-layered deployment इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। अलग-अलग फोर्स जंगल के कठिन इलाकों में synchronized operations चला रही हैं, जबकि स्थानीय intelligence inputs के आधार पर movement, shelter और logistics routes पर भी लगातार नजर रखी जा रही है।
अब बचे 12 दिन, दबाव अपने चरम पर
मिशन 2026 के समापन में अब सिर्फ 12 दिन शेष हैं। ऐसे में बस्तर पुलिस और अन्य सुरक्षा बल अब उच्चतम स्तर की सतर्कता, फोकस और आक्रामकता के साथ काम कर रहे हैं। अंतिम चरण में रणनीति साफ है—बचे हुए कैडरों को या तो आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया जाए, या फिर निर्णायक कार्रवाई के जरिए नेटवर्क का समापन कर दिया जाए। जिन वांछित नक्सलियों को लगातार समर्पण की अपील की जा रही है, उनके लिए भी संदेश साफ है कि निर्धारित समय-सीमा के भीतर surrender नहीं करने पर उन्हें फोर्स का सामना करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष: क्या बस्तर वाकई निर्णायक मोड़ पर है?
21 मार्च 2026 तक की तस्वीर बताती है कि छत्तीसगढ़, खासकर बस्तर, में नक्सलवाद की कमर बुरी तरह टूट चुकी है। भर्ती लगभग थम गई है, top leadership पर बड़े वार हुए हैं, core areas में सुरक्षा बलों की पकड़ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है और अब अभियान गिनती के बचे शीर्ष नेताओं तथा उनके साथियों तक सिमटता दिख रहा है। फिर भी पूर्ण और अंतिम खत्मे की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अब निर्णायक एंड गेम चरण में पहुंच चुकी है, जहां अगले कुछ दिन पूरे अभियान की दिशा तय कर सकते हैं।
