जादू-टोना के शक में बाप-बेटों पर कहर: बंधक बनाकर पीटा; अर्धनग्न कर घुमाया, हाईकोर्ट ने DGP से मांगा जवाब

हाईकोर्ट बिलासपुर

हाईकोर्ट बिलासपुर

रायपुर जिले के अभनपुर क्षेत्र में जादू-टोना के संदेह में एक ही परिवार के तीन लोगों के साथ हुई बर्बरता के मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने न्यायिक आदेशों का पालन नहीं किए जाने और निष्पक्ष जांच में कथित लापरवाही को गंभीरता से लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ चल रही विभागीय जांच की रिपोर्ट शपथपत्र के साथ प्रस्तुत की जाए। मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को तय की गई है।

इस प्रकरण में अदालत ने साफ संकेत दिया है कि भीड़ हिंसा, सार्वजनिक अपमान और पुलिस की भूमिका जैसे गंभीर पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि मामले में केवल आपराधिक घटना ही नहीं, बल्कि न्यायिक निर्देशों के अनुपालन और पुलिस के आचरण की भी गंभीर समीक्षा जरूरी है।

अभनपुर में एक परिवार के तीन लोगों के साथ हुई थी क्रूरता

पूरा मामला रायपुर जिले के अभनपुर थाना क्षेत्र का है। 13 मार्च 2025 को तिलक साहू पर ग्रामीणों ने कथित तौर पर काला जादू करने का आरोप लगाया। इसके बाद भीड़ ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। जब उनके पिता अमर सिंह साहू और भाई नरेश साहू बीच-बचाव के लिए पहुंचे, तो भीड़ ने उन्हें भी नहीं छोड़ा और तीनों को निशाना बना लिया।

आरोप है कि ग्रामीणों ने तीनों को बुरी तरह पीटा, अर्धनग्न किया, चेहरे पर कालिख पोती और जूतों की माला पहनाकर गांव में घुमाया। यही नहीं, उन्हें चौराहे पर पूरी रात बंधक बनाकर रखने की बात भी सामने आई। इस घटना ने मानवीय गरिमा और कानून-व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े किए।

पुलिस पर शुरुआती कार्रवाई में लापरवाही के आरोप

घटना की सूचना डायल-112 के जरिए पुलिस तक पहुंची थी। आरोप है कि पुलिस मौके पर पहुंचने के बाद पीड़ितों से ऐसे कागजों पर हस्ताक्षर करवा कर चली गई, जिनमें शिकायत नहीं करने जैसी बात लिखी गई थी। इसके बाद पीड़ितों को गांव के बाहर छोड़ दिए जाने का आरोप भी सामने आया।

जब पीड़ितों की शिकायत के आधार पर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तब उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आरोपियों के खिलाफ छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 समेत अन्य धाराओं में प्रकरण दर्ज कर चालान पेश करने का निर्देश दिया।

कोर्ट के आदेश के बाद भी हल्की धाराओं में दर्ज हुआ मामला

अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पुलिस ने 21 आरोपियों के खिलाफ केवल जमानती धाराओं में मामला दर्ज किया। इसी बिंदु को लेकर पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि घटना की गंभीरता के अनुरूप धाराएं नहीं लगाई गईं और अदालत के आदेश को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को भीड़ हिंसा से जुड़ा गंभीर मामला मानते हुए एसपी, आईजी और डीजीपी से जवाब मांगा। इससे साफ हो गया कि अदालत केवल घटना की सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच और प्रशासनिक जवाबदेही के पूरे ढांचे को भी देख रही है।

डीजीपी के शपथपत्र में पुलिस चूक की आशंका स्वीकार

मामले की पिछली सुनवाई में डीजीपी की ओर से दाखिल शपथपत्र में यह स्वीकार किया गया था कि पुलिस स्तर पर मामले के निपटारे में चूक की आशंका है। इसी आधार पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे यह संकेत मिला कि पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे सवाल पूरी तरह निराधार नहीं हैं।

अब हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि विभागीय जांच का नतीजा नए शपथपत्र के साथ अदालत के सामने रखा जाए। अदालत जानना चाहती है कि जिन अधिकारियों पर लापरवाही या आदेशों की अनदेखी के आरोप हैं, उनके खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई हुई है।

दो पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई

इस मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी इंस्पेक्टर सिद्धेश्वर प्रताप सिंह और सब-इंस्पेक्टर नरसिंह साहू के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए हैं। दोनों अधिकारियों को चार्जशीट भी जारी की जा चुकी है। हाईकोर्ट ने इस पहलू को गंभीरता से देखते हुए कहा है कि संबंधित पुलिस अधिकारियों के आचरण की समीक्षा जरूरी है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट में अपनी शिकायतें, दस्तावेज और अन्य सबूत पेश करने के लिए स्वतंत्र है। ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार पूरे मामले पर निर्णय लेना होगा।

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हाईकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से निपटाई, लेकिन मामला पूरी तरह बंद नहीं

हाईकोर्ट ने याचिका का आंशिक निपटारा करते हुए पुलिस अधिकारियों के आचरण से जुड़े मुद्दे को लंबित रखा है। अदालत का मानना है कि मामले में सार्वजनिक अपमान, भीड़ की हिंसा और पुलिस की कथित निष्क्रियता जैसे गंभीर आरोप हैं, इसलिए इसकी निगरानी आवश्यक है।

यही वजह है कि कोर्ट ने विभागीय जांच की प्रगति और परिणाम को लेकर डीजीपी से विस्तृत शपथपत्र मांगा है। इससे यह साफ है कि अदालत इस मामले को केवल एक सामान्य आपराधिक केस की तरह नहीं देख रही, बल्कि संस्थागत जवाबदेही के नजरिए से भी इसकी पड़ताल कर रही है।

 

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