क्या जंग से चलता है अमेरिकी बाज़ार? युद्ध से कैसे चमकता है इनका कारोबार!
Special Report । इतिहास गवाह है कि शीत युद्ध के बाद से अमेरिका ने खुद को एक स्थायी युद्ध अर्थव्यवस्था (Permanent War Economy) में ढाल लिया है। यह कोई छुपा राज नहीं है कि अमेरिकी रक्षा बजट (Defense Budget) दुनिया के अगले दस सबसे बड़े देशों के कुल सैन्य खर्च से भी अधिक है। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या यह खर्च राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है, या फिर मुनाफे के एक ऐसे तंत्र के लिए जिसे मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स (Military-Industrial Complex) कहा जाता है? आइए, आंकड़ों और तथ्यों के सहारे समझते हैं इस खर्चीले धंधे की असली तस्वीर।
युद्ध कितना खर्चीला है? (त्रिलियन डॉलर का सवाल)
युद्ध की लागत का अंदाजा सिर्फ युद्ध के मैदान में खर्च होने वाले गोले-बारूद से नहीं लगाया जा सकता। इसकी गणना में युद्ध के बाद वर्षों तक दिग्गजों (वेटरन्स) के इलाज, हथियारों के रखरखाव और ब्याज पर चुकाए गए कर्ज को भी शामिल किया जाता है।
इराक और अफगानिस्तान का उदाहरण: ब्राउन यूनिवर्सिटी के कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के अनुसार, अमेरिका ने अकेले इराक युद्ध (Iraq War) पर अब तक लगभग 1.79 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर दिए हैं। अगर इसमें वेटरन्स के दीर्घकालिक मेडिकल केयर और डिसेबिलिटी बेनिफिट्स को जोड़ दिया जाए, तो 2050 तक यह राशि बढ़कर 2.89 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी।
मानवीय क्षति: इस युद्ध में सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं हुआ, बल्कि ऑपरेशन इराकी फ्रीडम के दौरान 4,419 अमेरिकी सैनिक मारे गए, जो इस खर्चीले धंधे की असली कीमत है।
डूम्सडे बजट: 1 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंचता अमेरिकी रक्षा खर्च
अमेरिकी रक्षा बजट साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। 2025 में यह लगभग 895 अरब डॉलर था, जो अब 2026 में 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को छूने की ओर अग्रसर है।
2025 का बजट: पेंटागन ने 2025 के लिए 961 अरब डॉलर के बजट का अनुरोध किया था। इसमें 848.3 अरब डॉलर का डिस्क्रेशनरी डिफेंस बजट और 113 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च शामिल था। इस बजट में राष्ट्रपति ट्रम्प की महत्वाकांक्षी मिसाइल डिफेंस पहल गोल्डन डोम (Golden Dome) के लिए 25 अरब डॉलर मांगे गए थे।
सेनाओं का बंटवारा: इस बजट में अमेरिकी वायुसेना (Air Force) को 301.1 अरब डॉलर, नेवी (Navy) को 292.2 अरब डॉलर और आर्मी (Army) को 197.4 अरब डॉलर देने का प्रस्ताव था। स्पेस फोर्स (Space Force) के बजट में 30 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी करके इसे 40 अरब डॉलर किया गया।
जीडीपी (GDP) में हिस्सेदारी: हालांकि शीत युद्ध के दौरान (1960 के दशक में) रक्षा खर्च जीडीपी का 9 प्रतिशत तक था, आज यह घटकर लगभग 3.1 प्रतिशत पर आ गया है। लेकिन चूंकि अमेरिकी जीडीपी बहुत बड़ी है, इसलिए 3 प्रतिशत भी करीब 850 अरब डॉलर के बराबर बैठता है।
युद्ध से मुनाफा: कैसे कमाते हैं हथियार कारोबारी?
युद्ध की आग में जहां आम जनता जलती है, वहीं हथियार कारोबारी (Defense Contractors) सोना उगलते हैं। SIPRI (Stockholm International Peace Research Institute) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की टॉप-100 हथियार कंपनियों में से 39 अमेरिकी कंपनियों की साल 2024 में कुल कमाई में 3.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ, जो 334 अरब डॉलर तक पहुंच गई। इसका मुख्य कारण यूक्रेन और मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध थे।
टॉप 5 हथियार कंपनियां और उनका मुनाफा
पेंटागन का करीब आधा बजट सीधे इन ठेकेदारों (Contractors) की जेब में जाता है। ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक, 2001 से अफगानिस्तान युद्ध की शुरुआत के बाद से पेंटागन ने 14 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए हैं, जिसका एक तिहाई से लेकर आधा हिस्सा सीधे मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर्स को दिया गया। इनमें से ज्यादातर ठेके सिर्फ पांच कंपनियों को मिले: लॉकहीड मार्टिन, बोइंग, जनरल डायनेमिक्स, रेथियॉन और नॉर्थ्रॉप ग्रम्मन।
आइए जानते हैं कि ये कंपनियां कैसे मुनाफा कमाती हैं
कैसे कमाया मुनाफा?
लॉकहीड मार्टिन – F-35 लड़ाकू विमान – 3.2 प्रतिशत – F-35 की डिलीवरी में देरी के बावजूद (या उसके चलते) कंपनी की कमाई बढ़ी।
जनरल डायनेमिक्स – Columbia-class, Virginia-class पनडुब्बियां – 8.1 प्रतिशत – Columbia-class पनडुब्बी परियोजना 16 महीने लेट और 17 अरब डॉलर ओवरबजट होने के बावजूद मुनाफा।
नॉर्थ्रॉप ग्रम्मन – सेंटिनल ICBM (अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल) – 3.3 प्रतिशत – सेंटिनल मिसाइल का बजट 80 प्रतिशत बढ़कर 141 अरब डॉलर हुआ, जिससे कंपनी की कमाई बढ़ी।
RTX (पूर्व में रेथियॉन) – विभिन्न मिसाइल सिस्टम और रडार – जानकारी उपलब्ध नहीं – यूक्रेन युद्ध के कारण मिसाइलों की मांग बढ़ने से फायदा।
लागत-प्लस (Cost-Plus) का फॉर्मूला: देरी का मतलब ज्यादा पैसा
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अमेरिकी रक्षा अनुबंध (Contracts) अक्सर कॉस्ट-प्लस आधार पर दिए जाते हैं। इसका मतलब है कि सरकार प्रोजेक्ट की पूरी लागत वहन करती है और ऊपर से कंपनी को एक तय मुनाफा भी देती है। यानी, प्रोजेक्ट जितना लेट होगा और जितना महंगा होगा, कंपनी का मुनाफा उतना ही बढ़ेगा। यही कारण है कि F-35 या सेंटिनल मिसाइल जैसे प्रोजेक्ट बार-बार अपडेटेड बजट और समय-सीमा को पार कर जाते हैं, लेकिन कंपनियों पर कोई जुर्माना नहीं लगता, बल्कि उन्हें और पैसा मिलता है। यह प्रणाली कंपनियों को अक्षमता (inefficiency) के लिए पुरस्कृत करती है।
राजनीति और पैसे की सांठगांठ
इस पूरे तंत्र की रीढ़ है वॉशिंगटन की लॉबिंग (Lobbying)। हथियार कंपनियां यह सुनिश्चित करने के लिए भारी भरकम पैसा खर्च करती हैं कि कांग्रेस (Congress) उनके हितों के अनुसार कानून बनाए।
लॉबिंग खर्च: 2024 में अकेले रक्षा उद्योग (Defense Industry) ने लॉबिंग पर लगभग 150 मिलियन डॉलर खर्च किए।
चुनावी योगदान: इसके अलावा, इन ठेकेदारों ने सबसे हालिया चुनावी चक्र (Election Cycle) में चुनाव प्रचार के लिए 30 मिलियन डॉलर से अधिक का दान दिया। यह एक ऐसा चक्र है जहां पैसा देने वालों को हथियारों के ठेके मिलते हैं, और ठेकों से मिला पैसा फिर से अगले चुनावों में लगाया जाता है।
अमेरिका के लिए यह अर्थव्यवस्था कितनी टिकाऊ है?
युद्ध पर आधारित यह अर्थव्यवस्था न सिर्फ नैतिक रूप से प्रश्नांकित है, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह अमेरिका के लिए एक अभिशाप बनती जा रही है।
संसाधनों की बर्बादी: मिरियम पेम्बर्टन की पुस्तक Six Stops on the National Security Tour के अनुसार, पेंटागन खर्च को सही ठहराने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा शब्द का अस्पष्ट रूप से उपयोग किया जाता है। यह खर्च शिक्षा, स्वास्थ्य और अक्षय ऊर्जा (renewable energy) जैसे क्षेत्रों से पैसे निकालकर हथियारों में लगा रहा है, जबकि ये क्षेत्र अधिक रोजगार पैदा कर सकते हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर: न्यू मैक्सिको (New Mexico) के लॉस एलामोस या अर्कांसस (Arkansas) के पाइन ब्लफ जैसे क्षेत्र, जो सैन्य प्रतिष्ठानों पर निर्भर हैं, वहां युद्ध के समय तो समृद्धि आती है, लेकिन जैसे ही फंडिंग कम होती है, पूरा इलाका बर्बादी के कगार पर पहुंच जाता है। यह एक अस्थिर (unsustainable) आर्थिक मॉडल है।
राष्ट्रीय ऋण (National Debt): यह अंधाधुंध खर्च अमेरिका के राष्ट्रीय ऋण को आसमान पर ले जा रहा है, जो पहले ही 34 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा बजट में यह बेतहाशा बढ़ोतरी लंबे समय में टिकाऊ नहीं है।
शांति से नहीं, युद्ध से चलता है यह कारोबार
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा युद्ध और हथियारों के उत्पादन से जुड़ा हुआ है। यह कोई षड्यंत्र सिद्धांत (Conspiracy Theory) नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों और शोध पर आधारित तथ्य है। कॉस्ट-प्लस कॉन्ट्रैक्ट का मतलब है कि कंपनियों के लिए युद्ध खत्म होने की तुलना में जारी रहना कहीं अधिक फायदेमंद है।
जब तक अमेरिकी कांग्रेस में यह लॉबिंग का यह तंत्र और व्हाइट हाउस में हथियारों के बजट को बढ़ाने की यह होड़ जारी रहेगी, तब तक अमेरिका के लिए इस युद्ध अर्थव्यवस्था से बाहर निकलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन लगता है। यह एक ऐसा चक्र है जो खुद को लगातार पोषित करता है, और इसकी भेंट चढ़ती है आम अमेरिकी करदाता (taxpayer) की जेब और दुनिया भर में मची तबाही। जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति आइजनहावर (Eisenhower) ने चेतावनी दी थी, यह मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स वास्तव में अपनी चेतावनी के अनुरूप ही खतरनाक साबित हो रहा है।
NOTE: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शोध, समाचार रिपोर्टों और शैक्षणिक अध्ययनों पर आधारित है। प्रस्तुत तथ्य और आंकड़े ब्राउन यूनिवर्सिटी के कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट, SIPRI और अन्य खुले स्रोतों से लिए गए हैं। इस रिपोर्ट का उद्देश्य केवल विश्लेषणात्मक जानकारी प्रदान करना है।
