फीस बच्चे भरें, खाना बाहरी खाएं: छात्र भूखे रह गए, नेता-मंत्री और रिश्तेदार खाते रहे, सुखराम नागे कॉलेज में फूटा छात्रों का गुस्सा
धमतरी: आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र नगरी स्थित सुखराम नागे कॉलेज में आयोजित एक तथाकथित “छात्र उत्सव” उस समय विवादों में घिर गया, जब कार्यक्रम के दौरान छात्रों का गुस्सा खुलकर फूट पड़ा। वजह साफ है—जिस कार्यक्रम को बच्चों के सम्मान और सहभागिता के लिए आयोजित किया गया था, उसी कार्यक्रम में छात्र ही भूखे रह गए, जबकि बाहरी लोग, नेता, मंत्री और कुछ शिक्षकों के रिश्तेदार पेट भरकर भोजन करते रहे।
यह सवाल अब सिर्फ भोजन का नहीं, बल्कि छात्रों के आत्मसम्मान और कॉलेज प्रशासन की मानसिकता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।
छात्रों की थाली खाली, बाहरी मेहमानों की दावत जारी
छात्रों का आरोप है कि कार्यक्रम शुरू होते ही कॉलेज प्रशासन ने भोजन व्यवस्था पर कोई नियंत्रण नहीं रखा। नतीजा यह हुआ कि बाहरी लोग—जिनका कार्यक्रम से सीधा कोई लेना-देना नहीं था—पहले भोजन करने पहुंच गए। जब तक छात्रों की बारी आई, तब तक भोजन समाप्त हो चुका था।
छात्रों का सीधा आरोप है कि नेता, मंत्री और कुछ शिक्षकों के रिश्तेदारों को विशेष तवज्जो दी गई, जबकि असली हकदार—यानी छात्र—किनारे खड़े देखते रह गए।
कार्यक्रम बच्चों के लिए था या वीआईपी खातिरदारी के लिए?
छात्रों ने तीखे सवाल उठाए हैं—
जब कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए था, तो प्राथमिकता उन्हें क्यों नहीं दी गई?
क्या कॉलेज प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं थी कि सबसे पहले छात्रों की भोजन व्यवस्था सुनिश्चित की जाती?
क्या कॉलेज अब शिक्षा का केंद्र है या नेताओं और रिश्तेदारों की मेहमाननवाजी का मंच?
छात्रों का कहना है कि वे सालभर फीस भरते हैं, नियमित कक्षाओं में उपस्थित रहते हैं और वर्षों की मेहनत से पढ़ाई करते हैं। लेकिन जब उनके लिए कोई आयोजन होता है, तो उन्हीं को बुनियादी सुविधा से वंचित कर दिया जाता है।
प्रशासन की लापरवाही या जानबूझकर किया गया भेदभाव?
इस पूरे घटनाक्रम ने कॉलेज प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रों का मानना है कि यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि स्पष्ट लापरवाही और मानसिकता का प्रतिबिंब है, जिसमें छात्रों से ज्यादा अहमियत “पहचान” और “रसूख” को दी जाती है।
यदि प्रशासन चाहता, तो साफ सूची, टोकन सिस्टम या अलग काउंटर बनाकर छात्रों के लिए भोजन सुनिश्चित किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया—और यही बात छात्रों को सबसे ज्यादा चुभ रही है।
आत्मसम्मान की लड़ाई
छात्रों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं उनके आत्मविश्वास और सम्मान को ठेस पहुंचाती हैं। आदिवासी क्षेत्र के छात्रों को पहले ही कई चुनौतियों से जूझना पड़ता है, ऐसे में कॉलेज के भीतर इस तरह का व्यवहार न्याय और समानता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
अब सवाल यह है कि—
क्या कॉलेज प्रशासन इस मामले में जवाबदेही तय करेगा?
क्या भविष्य में कार्यक्रम वास्तव में छात्रों के लिए होंगे या फिर यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?
यह घटना सिर्फ एक कॉलेज की नहीं, बल्कि उस सोच की तस्वीर है, जहां छात्र सबसे आखिर में याद आते हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस शर्मनाक घटना से सबक लेता है या फिर छात्रों की आवाज को भी यूं ही अनसुना कर दिया जाएगा।
