क्या भारत में भी बन रही है ‘एपस्टीन फाइल’? दिल्ली में सि‍र्फ एक महीने में कहां गायब हो गए 800 से ज्यादा लोग? 

दिल्ली : क्या भारत में भी किसी संगठित नेटवर्क की परछाईं उभर रही है—जिसे दुनिया ने कभी “एपस्टीन फाइल्स” के नाम से जाना? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि दिल्ली में साल 2026 के पहले ही महीने में 800 से ज्यादा लोगों के लापता होने की खबरें सामने आई हैं। औसतन हर दिन 50 से अधिक लोग गायब—और इनमें सबसे चिंताजनक तथ्य यह कि बड़ी संख्या 12 से 18 वर्ष की किशोरियों की बताई जा रही है। यह महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था, सामाजिक सतर्कता और पुलिस तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

दुनिया ने अमेरिकी कांड में जेफ़री एपस्टीन के मामले से सीखा कि कैसे ताकत, पैसा और नेटवर्क मिलकर वर्षों तक अपराध को छिपाए रख सकते हैं। भारत में कोई सीधा आरोप नहीं, लेकिन घटनाओं की श्रृंखला—और पीड़ितों की प्रोफाइल—सवाल पूछने को मजबूर करती है।

दिल्ली में लापता: भयावह ट्रेंड

राष्ट्रीय राजधानी में जनवरी 2026 के पहले दो हफ्तों में 807 लोगों के लापता होने की सूचना सामने आई। दिल्ली पुलिस के अनुसार इनमें 191 नाबालिग और 616 वयस्क शामिल हैं। अब तक 235 लोगों का ही पता चल सका है, जबकि 572 लोग अभी भी लापता हैं। नाबालिगों, विशेषकर किशोरियों की संख्या अधिक होना चिंता को और गहरा करता है—क्योंकि इस उम्र में शोषण, तस्करी और ऑनलाइन फंसाने जैसे जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैं।

मानवाधिकार आयोग और अदालत की सख्ती

मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार और पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इसके समानांतर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

‘एपस्टीन फाइल’ से तुलना क्यों?

एपस्टीन प्रकरण ने यह दिखाया कि कैसे प्रभावशाली नेटवर्क, अंतरराज्यीय कनेक्शन और कमजोर निगरानी अपराध को लंबे समय तक ढक सकते हैं। भारत में ऐसी किसी “फाइल” के अस्तित्व का दावा नहीं किया जा रहा, लेकिन समानताएं—जैसे नाबालिग पीड़ितों की संख्या, लापता होने के पैटर्न, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए संपर्क—जांच को सिस्टमिक एंगल से देखने की मांग करती हैं। यह तुलना चेतावनी है, आरोप नहीं।

सिर्फ दिल्ली नहीं, देशव्यापी चिंता

दिल्ली के आंकड़े एक संकेत हो सकते हैं। देश के कई राज्यों से भी किशोरियों के लापता होने की खबरें आती रही हैं। अलग-अलग राज्यों में दर्ज मामलों का डेटा अक्सर बिखरा रहता है—जिससे राष्ट्रीय स्तर पर पैटर्न पहचानना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि एकीकृत डेटाबेस, तेज़ सूचना-साझाकरण और समयबद्ध कार्रवाई के बिना ऐसे मामलों में नेटवर्क तोड़ना कठिन है।

संभावित कारण और चुनौतियां

डिजिटल ट्रैप्स: सोशल मीडिया/मैसेजिंग ऐप्स के जरिए फंसाना

तस्करी का खतरा: अंतरराज्यीय/सीमा-पार नेटवर्क

रिपोर्टिंग गैप: FIR में देरी, परिवारों का दबाव

समन्वय की कमी: राज्यों और एजेंसियों के बीच डेटा साझा न होना

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