‘वंदे मातरम्’ पर बोले इमाम – जहां वंदे मातरम् अनिवार्य, वहां से बच्चों को निकालें…

Vande Mataram : केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नए और सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय के 28 जनवरी के 10 पन्नों के आदेश में कहा गया है कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम् का पूरा 6 छंदों वाला संस्करण (3 मिनट 10 सेकंड) बजाया या गाया जाना अनिवार्य होगा। इस दौरान हर व्यक्ति को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा।

आदेश में क्या-क्या शामिल है?

तिरंगा फहराने के अवसर पर

राष्ट्रपति के किसी कार्यक्रम में आगमन के समय

राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम भाषण या संबोधन से पहले और बाद में

राज्यपाल के भाषण से पहले और बाद में

स्कूल सभाओं सहित अन्य आधिकारिक समारोहों में

यदि राष्ट्रगान (जन गण मन) और वंदे मातरम् एक साथ गाया या बजाया जाता है, तो वंदे मातरम् पहले बजाया जाएगा। श्रोताओं को दोनों गीतों के दौरान सावधान मुद्रा में खड़ा रहना अनिवार्य होगा।

विशेष अपवाद

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जब किसी समाचार या वीडियो में राष्ट्रगान फिल्म के रूप में बजाया जाता है, तो श्रोताओं से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि खड़े होने से फिल्म का प्रदर्शन बाधित होगा और राष्ट्रगान की गरिमा बढ़ाने के बजाय अव्यवस्था और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

विरोध की आवाजें

उज्जैन के इमाम मुफ्ती सैय्यद नासिर अली नदवी ने इस आदेश को इस्लाम विरोधी बताया है। उन्होंने कहा “यह आदेश हमारी धार्मिक आजादी पर हमला है। वंदे मातरम् में कहा गया है कि हिंदुस्तान की भूमि की हम पूजा करते हैं, लेकिन मुसलमान के लिए यह बिल्कुल भी सही नहीं है कि वह अल्लाह के साथ किसी और को शरीक कर अपनी पूजा में शामिल करे।”

मुफ्ती ने आगे कहा “हम कहेंगे कि जिन स्कूलों में वंदे मातरम् को अनिवार्य किया जा रहा है, वहां से सभी मुसलमान अपने बच्चों को निकाल लें। हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते कि वह इस्लाम में रहकर किसी और खुदा की इबादत करे। यह फैसला कानून के खिलाफ है। मेरी सरकार से गुजारिश है कि अपना फैसला वापस ले।”

भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी 12 फरवरी को विरोध जताते हुए कहा “भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। हमें संविधान के आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है। वंदे मातरम् के सम्मान को लेकर कोई झगड़ा नहीं है। विवाद केवल वंदे मातरम् की कुछ लाइनों को लेकर है, जो हमारी मजहबी आजादी पर अंकुश लगाती हैं।”

मसूद ने कहा “मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस नए कानून की स्टडी कर रहा है। जब तक बोर्ड अपनी राय नहीं बना लेता, तब तक हम कोई निर्णय नहीं लेंगे।”

शिक्षा मंत्री का जवाब

स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने कांग्रेस विधायक के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा “जो भी राष्ट्र का नागरिक है, उसे राष्ट्र का कानून मानना ही होगा। चाहे मदरसा हो या कोई अन्य स्कूल, सभी को वंदे मातरम् का गायन करना होगा।”

वंदे मातरम् का इतिहास

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर ‘वंदे मातरम्’ लिखा था। यह 1882 में उनकी पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में उपन्यास ‘आनंदमठ’ के हिस्से के रूप में छपा था।

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम् गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गई थीं।

क्यों हटाए गए थे चार छंद?

सव्यसाची भट्टाचार्य की किताब ‘वंदे मातरम्: द बायोग्राफी ऑफ ए सॉन्ग’ के मुताबिक, 20 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस को पं. जवाहरलाल नेहरू ने चिट्ठी लिखी थी कि वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और भाषा मुसलमानों को असहज करती है।

22 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने मूल गीत के छह पैरा में से चार पैरा हटाने का फैसला लिया था। इस बैठक में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजनी नायडू सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल थे।

अब क्या होगा?

सरकार ने आदेश दिया है कि सभी स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत वंदे मातरम् बजाने के बाद ही होगी। यह आदेश पूरे देश में लागू होगा। मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं का तर्क है कि बाद के छंदों में मातृभूमि की वंदना जिस स्वरूप में की गई है, वह उनके मजहबी सिद्धांतों (एकेश्वरवाद) के खिलाफ है।

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