2013 झीरम कांड का मुख्य साजिशकर्ता चैतू: जिसने कांग्रेस नेताओं समेत 32 लोगों की ली थी जान, अब किया आत्मसमर्पण
झीरम हमले के मास्टरमाइंड चैतू ने किया सरेंडर
सुकमा। बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद को एक बड़ा झटका लगा है। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) के वरिष्ठ सदस्य चैतू उर्फ श्याम दादा ने शुक्रवार को सुकमा जिले में सुरक्षाबलों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। चैतू पर 25 लाख रुपये का इनाम घोषित था और वह 2013 के झीरम घाटी हमले का मास्टरमाइंड माना जाता है, जिसमें छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पूरी शीर्ष नेतृत्व मिट्टी में मिल गई थी। चैतू के साथ कुल 10 नक्सलियों ने हथियार डाले, जिन पर कुल 65 लाख रुपये का इनाम था। बस्तर आईजी सुंदरराज पी ने बताया कि चैतू ने कई वर्षों तक CPI (माओइस्ट) की दर्भा डिवीजन का नेतृत्व किया था और छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर सक्रिय था।
35 वर्ष बस्तर के जंगलों में बिताए:
चैतू (63 वर्ष) ने 45 वर्षों से नक्सल संगठन में रहते हुए 35 वर्ष बस्तर के जंगलों में बिताए। सरेंडर के बाद उन्होंने कहा, “रूपेश और सोनू दादा ने भी हथियार डाल दिए हैं। नक्सल संगठन में अब कुछ नहीं बचा। मेरी उम्र को देखते हुए और वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर मैंने हिंसा का रास्ता छोड़ने का फैसला किया।” सरेंडर करने वालों में डिविजनल कमेटी मेंबर सरोज उर्फ ऊर्मिला (8 लाख इनाम), एरिया कमेटी मेंबर्स भूपेश उर्फ सहायक राम, प्रकाश, कमलेश उर्फ झित्रू, जानकी उर्फ रायमती कश्यप, संतोष उर्फ सन्नू, नवीं, तथा पार्टी मेंबर्स रामशिला और जयंती कश्यप शामिल हैं।
झीरम घाटी हमला: 2013 की ब्लैक डे, जिसने कांग्रेस को झकझोर दिया
25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले नक्सलियों ने दरभा घाटी (झीरम घाटी) में कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ पर घात लगाकर हमला किया था। सुकमा में रैली के बाद जगदलपुर लौट रहे काफिले में करीब 25 गाड़ियां और 200 से अधिक नेता-कार्यकर्ता सवार थे। काफिले में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, कवासी लखमा, महेंद्र कर्मा, मलकीत सिंह गैदू और उदय मुदलियार जैसे शीर्ष नेता शामिल थे। दोपहर करीब 3:40 बजे झीरम घाटी पहुंचते ही नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता रोका और 200 से अधिक हथियारबंद नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। IED ब्लास्ट से एक गाड़ी का हिस्सा नदी में उड़ गया, जो आज भी वहीं फंसा हुआ है।
बेरहमी से नेताओं के ऊपर कर दी अंधाधुंध फायरिंग :
हमला करीब डेढ़ घंटे चला। नंदकुमार पटेल और दिनेश की मौके पर मौत हो गई। सलवा जुडूम आंदोलन के प्रणेता महेंद्र कर्मा को नक्सलियों ने नाम लेकर पहचाना और बेरहमी से 100 गोलियां मार दीं। कुल 32 लोगों की मौत हुई, जिनमें 16 कांग्रेस नेता, 7 ड्राइवर-सुरक्षाकर्मी और अन्य शामिल थे। चश्मदीदों के अनुसार, नक्सलियों ने पहाड़ियों से उतरकर हर गाड़ी चेक की और चुनिंदा हत्याएं कीं। हमला पूरी योजना के साथ अंजाम दिया गया था—जगह का चयन, बम लगाना और भागने की रणनीति सब तय था। खुफिया एजेंसियों को कोई भनक तक नहीं लगी।
कांग्रेस ने ‘सुपारी किलिंग’ करार दिया:
कांग्रेस ने हमले को ‘राजनीतिक साजिश’ और ‘सुपारी किलिंग’ करार दिया, जबकि बीजेपी सरकार पर सुरक्षा लापरवाही का आरोप लगाया। हमले के दो दिन बाद NIA को जांच सौंपी गई। सितंबर 2014 में पहली चार्जशीट और अक्टूबर 2015 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल हुई। जगदलपुर NIA कोर्ट में ट्रायल जारी है, लेकिन रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं हुई। हमले से बचने वाले नेता मलकीत सिंह गैदू ने कहा, “नक्सलियों ने न वीडियो जारी किया, न जिम्मेदारी ली। ये सुपारी किलिंग थी। NIA जांच या SIT की जरूरत है।”
सरेंडर के पीछे सुरक्षाबलों का दबाव
पुलिस के अनुसार, डीआरजी, बस्तर फाइटर्स, सीआरपीएफ की लगातार कार्रवाइयों, बड़े नक्सली सरेंडर और राज्य सरकार की अपीलों ने चैतू समेत इन नक्सलियों को हथियार डालने पर मजबूर किया। सुकमा एसपी किरण चव्हाण ने इसे ‘माओवाद के तेजी से पतन’ का प्रमाण बताया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे ‘2026 तक नक्सल-मुक्त भारत’ की दिशा में ऐतिहासिक कदम कहा। बस्तर आईजी ने पोलित ब्यूरो सदस्य देवजी, केंद्रीय समिति सदस्य रामदर, DKSZC सदस्य पापाराव, देवा (बार्से देवा) समेत अन्य नक्सलियों की तलाश जारी रखने की बात कही।
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सैकड़ों नक्सली कर चुके हैं सरेंडर :
यह सरेंडर 2025 में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की सफलता का प्रतीक है। जून 2025 में 26 नक्सलियों को मार गिराया गया था, जिसमें CPI (माओइस्ट) के महासचिव बसवराजू (1.5 करोड़ इनाम) भी शामिल थे, जो झीरम हमले के पीछे थे। तेलंगाना और ओडिशा में भी सैकड़ों नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। सरेंडर करने वाले नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।
