कुलियों की रोजी-रोटी पर संकट ! : रायपुर रेलवे स्टेशन में किया प्रदर्शन, बैटरी चलित कार लाने का विरोध
कुलियों ने खोला मोर्चा
रायपुर – राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन में बैटरी से चलने वाली कार सेवा शुरू होते ही कुलियों में आक्रोश फैल गया है। सोमवार सुबह प्लेटफार्म नंबर एक पर दर्जनों कुली और उनके परिजन प्रदर्शन करते नजर आए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस नई सुविधा से उनकी रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ा है और अब उनके सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया है।
पहले ही घट चुका है काम, अब पूरी तरह खतरे में
कुली संघ का कहना है कि पहले से ही एस्केलेटर और लिफ्ट लगने के बाद उनका काम काफी कम हो गया था। अब बैटरी से चलने वाली कार आ जाने के बाद यात्रियों की ओर से बोझ उठाने के लिए उन्हें बुलाने की संभावना और भी कम हो गई है।
संघ के उपाध्यक्ष सुरेश यादव ने कहा,
“कोविड के बाद से हमारा 80% काम खत्म हो चुका था। अब यह कार भी आ गई है। कोई यात्री अब हमसे सामान नहीं उठवाएगा। यह विकास नहीं, हमारे लिए अत्याचार है।”

प्रदर्शनकारियों की मांग: टेंडर रद्द करो या दूसरा रोजगार दो
कुली समिति संघ के अध्यक्ष थानेश्वर साहू ने बताया कि “हम 22 सितंबर से रेलवे अधिकारियों से लगातार मिल रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अब मजबूर होकर हमें प्रदर्शन करना पड़ रहा है। सीनियर डीसीएम से बात हुई, लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि टेंडर रद्द नहीं होगा। अगर ऐसा है, तो हमें कोई दूसरा काम दिया जाए।”
यात्री सुविधा या व्यवसायिक सौदा?
रेलवे की ओर से यह बैटरी कार सेवा टेंडर प्रक्रिया के तहत शुरू की गई है। कुली संघ ने इस पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि यह यात्रियों की सुविधा के लिए है, तो यह मुफ्त क्यों नहीं है? बात दें कि इस बैटरी कार का प्रति व्यक्ति किराया 50 रुपये और सामान के लिए 30 रुपये तय किया गया है।

परिवारों पर मंडरा रहा आर्थिक संकट
कुली परिवारों का कहना है कि अब उनके सामने घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और मकान किराया देने तक का संकट पैदा हो गया है। सीमा यादव, जो एक कुली के परिवार से हैं, ने कहा “हमारा सारा जीवन इस काम पर निर्भर है। अब यही बंद हो रहा है। बच्चों की फीस कैसे भरें? खाने के लाले पड़ रहे हैं। ये फैसला हमारे लिए न्याय नहीं, अन्याय है।”
कुली संघ ने खोला मोर्चा
कुली संघ ने अब बैटरी कार सेवा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनकी मांग है कि या तो इस सेवा को बंद किया जाए, या फिर उन्हें रेलवे द्वारा कोई वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराया जाए, जिससे वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें।

