बस्तर दशहरा में फूल रथ परिक्रमा विवादों के बीच पूरी, राजा-रानी को रथ पर बैठाने की मांग से घंटों रुका आयोजन

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में बुधवार को परंपरागत फूल रथ परिक्रमा गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के बीच पूरी हुई। मां दंतेश्वरी का छत्र सजाए गए चार पहियों वाले रथ पर रखा गया और प्रधान पुजारी रथ पर सवार होकर गोलबाजार के बीच मावली माता की परिक्रमा करते दिखे। इस दौरान पुलिस जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर मां के छत्र को सलामी दी।

60 साल बाद फिर उठी पुरानी मांग

परिक्रमा शुरू होने से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया। बस्तर संभाग के अलग-अलग गांवों से पहुंचे पटेल समुदाय ने 60 साल बाद फिर यह मांग दोहराई कि बस्तर राजपरिवार के राजा-रानी को रथ पर बैठाया जाए, अन्यथा वे रथ नहीं खींचेंगे। उनकी जिद के चलते रथ घंटों तक खड़ा रहा और परिक्रमा शुरू नहीं हो पाई।

प्रशासन और राजपरिवार की कोशिश

बस्तर कलेक्टर हरिस एस और एसपी सलभ सिन्हा के समझाने के बावजूद पटेल समुदाय अड़ा रहा। आखिरकार, बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव खुद बारिश में पहुंचे और ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की। अंत में, राजा के पुजारी के रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र रखने के बाद परिक्रमा आगे बढ़ पाई।

1965 से बंद है परंपरा

रियासत काल में राजा-रानी मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ रथ पर सवार होते थे। लेकिन यह परंपरा 1965 के बाद बंद हो गई। इस साल कमलचंद भंजदेव की शादी के बाद ग्रामीणों ने उन्हें रथ पर बैठाने की मांग उठाई थी, जिसे प्रशासन ने अनुमति नहीं दी। देर रात रथ सिरहासार चौक से निकला और गोलबाजार, मिताली चौक होते हुए मां दंतेश्वरी मंदिर तक पहुंचा। यह रस्म अगले तीन दिनों तक जारी रहेगी।

सात सौ साल पुरानी आस्था

ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि बस्तर दशहरा की रथ परिक्रमा की शुरुआत 1410 ईस्वी में महाराजा पुरुषोत्तम देव ने की थी। यह परंपरा हर साल दशहरे का मुख्य आकर्षण रहती है। हालांकि, विवाद पूरी तरह थमा नहीं है। पटेल समाज ने साफ कहा है कि 2 अक्टूबर को होने वाली विजय रथ परिक्रमा में वे फिर से राजा को “रथपति” की उपाधि दिलाने की मांग उठाएंगे। ऐसे में आशंका है कि दशहरे के अंतिम चरण में विवाद दोबारा भड़क सकता है।

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